Skip to main content

इश्क़


इश्क इबादत है इश्क खुदाई है,
ये तो मीरा है ये कन्हाई है ।

इश्क हर पल ही साथ रहता है,
बिछड़ भी जाएं तो कब जुदाई है ।

इश्क तुलसी का देखो मानस में,
इश्क गालिब की हर रुबाई है ।

इश्क घनानंद-सुजान का देखो,
इश्क बिहारी की कविताई है।

इश्क खामोशी से किया जाता,
बोलने से बड़ी रुसवाई है।

इश्क का रोग ऐसा पाकीज़ा,
इश्क ही इश्क की दबाई है ।

इश्क बाजार में नहीं बिकता,
इसकी कीमत तो कुल ख़ुदाई है।

      -अंजुमन आरज़ू ©✍

Comments

Popular posts from this blog

सरस्वती वंदना

हों गीत मेरे, संगीत भरे । लय ना लय हो, सरगम मुखरे । माँ शारदा विनती करूँ तुझ से । हों ये गीत अनूप, अटल-ध्रुव से । मेरे गीतों को आशीष दे माँ । ये मोहन हों, मुरली को धरे ॥1॥ लय ना लय हो स...

'इंद्रधनुष' (दोहा गीत)

इंद्रधनुष छाये गगन,खिले धरा का रूप । कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारुप ॥ इंद्रधनुष सा नेह तो, सतरंगी संसार । रंग मिलें मिलकर सजें, पायें रूप अनूप ॥ कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्र...

हम्द-02 रब के बंदों से की महब्बत है

रब    के   बंदों  से   की  महब्बत  है अपनी  तो    बस   यही   इबादत  है सारी   तारीफ़   है   ख़ुदा   के   लिए जिसकी  दोनों  जहाँ  में  अज़मत है फूल     पत्तों    में    बेल    बूटों   में देखिए   रब   की   ही    इबारत   है शुक्र है  रब का  जो दिया  सो दिया अपनी क़िस्मत से कब शिकायत है ये   नमाज़ें    ज़कात    हज    रोज़े रब  को   पाने  की  ही   रवायत  है ग़म  में  भी   ढूंढ  ली   ख़ुशी   मैंने ये   हुनर   उसकी  ही   इनायत  है लाख    बेचैनियाँ    सही    लेकिन उसके   एहसास  से  ही   राहत है जिसके...