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इश्क़


इश्क इबादत है इश्क खुदाई है,
ये तो मीरा है ये कन्हाई है ।

इश्क हर पल ही साथ रहता है,
बिछड़ भी जाएं तो कब जुदाई है ।

इश्क तुलसी का देखो मानस में,
इश्क गालिब की हर रुबाई है ।

इश्क घनानंद-सुजान का देखो,
इश्क बिहारी की कविताई है।

इश्क खामोशी से किया जाता,
बोलने से बड़ी रुसवाई है।

इश्क का रोग ऐसा पाकीज़ा,
इश्क ही इश्क की दबाई है ।

इश्क बाजार में नहीं बिकता,
इसकी कीमत तो कुल ख़ुदाई है।

      -अंजुमन आरज़ू ©✍

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