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किसी दिन

वज़्न    -221 1221 1221 122

अरक़ान -मफ़ऊलु मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन अख़रब मक्फ़ूफ़ महज़ूफ़

                  ग़ज़ल

ख़ुद थक के डूब जाएगा मजधार किसी दिन
क़श्ती लगेगी ज़िंदगी की पार किसी दिन ।

मजबूत करो हौसलों से ख़ुद की ख़ुदी को
बाज़ू ही बनेंगे तेरी पतवार किसी दिन ।

इस्लाह मिले रोज़ जो उस्ताद की सादिक़
मशहूर होंगे अपने भी अशआर किसी दिन।

ख़ुद अपने हुनर की ज़रा आवाज़ सुनो तुम
दुनिया सुनेगी फिर वही झंकार किसी दिन ।

धीमी ही सही चाल लगातार चलें गर
मंज़िल भी पाएगी यही रफ्तार किसी दिन ।

चालीस श'अर हो गए हैं उम्र ग़ज़ल के
मक्ता भी हो ही जाएगा तैयार किसी दिन ।

मां बाप के रहते जो नहीं बांटी मिल्कियत
फिर होगा तमाशा सरे बाज़ार किसी दिन ।

तहज़ीब जो फर्जंद को हम अपने सिखाएं
इज़्ज़त न हो इबनत की कभी तार किसी दिन ।

उम्मीद के सूरज के मुकाबिल रहे कब तक
ऐ 'आरज़ू' छठ जाएगा कुहसार किसी दिन ।

      -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
06/05/2019
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शब्दकोश:-

फर्जंद   =बेटा
इबनत   =बेटी
कुहसार =कोहरा

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