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पहचान


आज-कल मैं कुछ
मुस्कुरा के चलती हूँ ।
झुका के नहीं
सिर उठा के चलती हूँ ।
अहं से नहीं...
अहम से ।

मैं मुस्कुरा के
चलती हूँ
क्योंकि
अब मेरी अपनी
अहम पहचान है....

अब भी मैं
अपने पिता
की बेटी तो हूँ,
पर मुस्कुराती हूँ
क्योंकि
अब वो भी
मेरे पिता हैं
जाने जाते हैं
मेरे नाम से...

मैं आज भी
अपने प्यारे भाई की
बहन तो हूँ
पर अब मैंने
अपनी पहचान
कुछ ऊँची कर ली है
एक उड़ान भर ली है
और अब,
मेरे अपने नाम से
आते हैं पत्र, घर में
विवाह पत्रिकाएं
ग्रह प्रवेश के
आमंत्रण भी
अब प्यारा भैया
मेरा भाई भी है.....

मैं मुस्कुरा के चलती हूँ
क्योंकि
अब 'वो' मेरे पति हैं. ..
कामकाजी होने की थकान
मिलके बांटते हैं
बिना हीन भावना के
सब्जियां भी काटते हैं
माना कि
सुखद एहसास है
उनकी पत्नी कहाना
पर ये भी तो
है कितना सुहाना
कि अब वो
मेरे पति हैं.....
मेरी पहचान
की गति हैं.....

मैं मुस्कुरा के चलती हूँ
हालाँकि,
मेरी अवस्था
चढ़ रही है
प्रोढ़ता के सोपान।
वृद्ध हो रही हूं मैं
पर मेरी पहचान
तरुण होती जा रही है
मेरे युवा बेटे को
भा रही है
और वो आज भी
मेरा ही बेटा है......

आजकल मैं
मुस्कुरा के चलती हूँ
झुका के नहीं
सिर उठा के चलती हूँ
क्योंकि
कुछ कम हुई
इस दुनिया की
बीमारी है
आज सब ने
मेरी ये पहचान
स्वीकारी है
किसी की बेटी
बहन, पत्नी या मां
होने के साथ ही...
मेरा अस्तित्व नारी है!!!!!
मेरी पहचान नारी है ।
मेरा अस्तित्व नारी है!!!
मेरी पहचान नारी है ।

स्वरचित एवं मौलिक रचना ।
©®🙏
      -अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र

__________________________
शब्दकोष :-
अहं   = अहंकार
अहम = अहमियत,महत्ता

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