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ग़ज़ल - 17 लब पे नग़्मा सजा लीजिए

लब    पे   नग़्मा   सजा   लीजिए रंज -ओ - ग़म गुनगुना लीजिए अपनी  कमियों के  एहसास को बाँसुरी    सा    बजा     लीजिए ख़ार मुश्किल के चुन चुन  सभी राह    आसाँ      बना   लीजिए दर्द  ने  मीर  -ओ - मीरा गढ़े दर्द   का  भी   मज़ा   लीजिए शम्स  हो  जाए  गर चे  गुरूब शम'अ बन  जगमगा  लीजिए सच  का दामन न छोड़ेंगे हम लाख   सूली   चढ़ा   लीजिए टूट   जाएँ   मरासिम   अगर राबता   फिर  बना   लीजिए झुक के क़दमों में माँ बाप के क़द  अना  का घटा  लीजिए आख़िरत  के  लिए 'आरज़ू' नेकियाँ कुछ कमा  लीजिए   -© अंजुमन आरज़ू     05/11/2019 रौशनी के हमसफ़र/17/2021 वज़्न -212 212 212
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ग़ज़ल - 16 सहर से शाम तक सूरज सा चलना भी ज़रूरी है

सहर  से   शाम  तक   सूरज  सा  चलना  भी ज़रूरी है निकलना  भी   ज़रूरी  है   कि   ढलना  भी  ज़रूरी  है सितारे  शम'अ  जुगनू  चाँद  ने   मिल   रात  रौशन की हुकूमत  शम्स  की  कुछ   पल   बदलना  भी ज़रूरी है चराग़ाँ   कर   लिया    बाहर    मगर   अंदर  अंधेरा  है दिया  इक  इल्म  का  दिल  में तो  जलना भी ज़रुरी है जिन्हें  हसरत हो  बादल की  वो पहले धूप तो चख लें अगर है छाँव  की  ख़्वाहिश  तो  जलना भी ज़रूरी है बुलंदी  ठीक  है  लेकिन   जहाँ  अपनों से  मिलना हो वहाँ   झरनों  सा  पर्वत  से  फिसलना  भी  ज़रूरी है मुहब्बत माँ की आ'ला पर फ़रोग़-ए-आल की ख़ातिर इन्हें  वालिद  की  नज़रों  से  दहलना...

ग़ज़ल-15 बस हौसलों से चाहता पहचान परिंदा

बस   हौसलों   से   चाहता   पहचान   परिंदा रखता  है   दिलों  में   यही   अरमान   परिंदा कुछ  दानों के  लालच में  लो  परवाज़ गँवाई अब   बंद  क़फ़स  में   हुआ   नादान  परिंदा रूदाद  सुनी  अर्श  से  तो  फ़र्ज़  समझ  कर अस्मत  के  लिए  चढ़  गया  परवान  परिंदा ग़श खा के गिरा  अर्श से वो  फ़र्श पे ज़ख़्मी फिर कुछ  दिनों का रह गया मेहमान परिंदा तन्हा  था  मगर  रग  में  रवाँ हौसला भी था मरते  हुए   भी  पा   गया   सम्मान   परिंदा जाँ-बाज़ है हिम्मत से जिया ज़ीस्त इसलिए कहला  रहा  है  आज भी  अरहान* परिंदा  अब 'आरज़ू' है ख़ुश कि बिना पंख जहां में परवाज़  ग़ज़ल  भर  रही  उनवान  परिंदा अरहान - राजा -© अंजुमन आरज़ू     11/1...

ग़ज़ल-14 बिन तुम्हारे ये लगे सारी ही महफ़िल तन्हा

बिन  तुम्हारे  ये  लगे  सारी  ही महफ़िल तन्हा चाहिए  कब हमें तुम बिन  यहाँ  मंज़िल तन्हा बे-हुनर  को  मिला  ए'ज़ाज़   बड़े   जलसे में देखता रह  गया फ़न अपना वो क़ाबिल तन्हा क़ामयाबी  में  करे  हर  कोई  रिश्ता   क़ायम सहनी पड़ती है मगर राह  की मुश्किल तन्हा शम्स या शम'अ, क़मर हो कि  बशर हो कोई रौशनी के लिए  जलते सभी तिल तिल तन्हा साथ  जिसने  भी जहाँ  में दिया सच्चाई का रह  गया  वो ही ज़माने के  मुक़ाबिल  तन्हा हौसला   देख  के   हैरान   हुआ   तूफ़ाँ  भी हमने पतवार बिना पा लिया  साहिल  तन्हा लाज़मी  है  कि  ज़रुरत  भी  तवज़्ज़ो पाएँ 'आरज़ू' ही तो फ़क़त है नहीं क़ामिल* तन्हा  क़ामिल - संपूर्ण  -© अंजुमन आरज़ू      01/10/2019 रौशनी के हमसफ़र /2021 ग़ज़ल-14/पृष्ठ क्र• 27  वज़्न -2122  1122  1122  22/112

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

ग़ज़ल-12 दिल में जो मेरे सच्चा इक़दाम नहीं होता

दिल  में  जो   मेरे  सच्चा   इक़दाम*  नहीं   होता  मंज़िल  न   मिली  होती   इक़राम*   नहीं   होता  जो अज़्म के हामिल हैं  कब  ठहरे  क़दम उनके जब  तक  न ज़फ़र  पा  लें  आराम  नहीं   होता हाक़िम की  हर इक  हाँ में हम भरते अगर हामी  गर्दिश  में   हमारा   फिर  अय्याम*  नहीं   होता  समझाइशें  देते  हैं  जिनको  न  समझ  कुछ भी बातों  के  सिवा  इनको  कुछ  काम  नहीं  होता रूदाद  क़बा*  की कुछ   अच्छी  हैं  अधूरी भी  हर   एक   फ़साने   का   अंजाम   नहीं   होता अल्लाह की मर्ज़ी भी लाज़िम है हर इक शय में सोचे  जो   फ़क़त   इंसाँ  वो  काम  नहीं  होता हालात  के  तू...

ग़ज़ल-11 ज़िंदगी का जैसा भी आग़ाज़ हो

ज़िंदगी    का    जैसा  भी   आग़ाज़  हो ख़त्म यूँ  हो, हम  पे  सब  को   नाज़ हो क्या  गिराएँ साज़िश - ए- दुश्मन  उसे ख़ुद  ख़ुदा जिसका यहाँ अफ़राज़* हो  बातों    में   मिश्री   सी  हो  शीरीनियाँ गुफ़्तग़ू    का   यूँ    मेरी    अंदाज़  हो बिन कहे  तुम  तक  पहुँच  जाए सदा पुर  असर    इतनी  मेरी   आवाज़ हो कुछ   ख़ुसूसी  काम  तो  हैं  लाज़मी चाहे  जितनी  ज़ीस्त  में  ईजाज़* हो  ये   नुमाइश   इश्क़  में  अच्छी  नहीं क्या  ज़रूरी  है  कि यूँ  पर्दाज़*  हो  कब  ज़ियादा  की  है   मेरी 'आरज़ू' बस फ़लक तक ही मेरी परवाज़ हो  अफ़राज़ - बुलंद करने वाला,  ईजाज़ - संक्षिप्तता, पर्दाज़ - प्रदर्शन -© अंजुमन 'आरज़ू'  24/08/2020...