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ग़ज़ल-08 इन क़िताबों में निहा* है ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

इन  क़िताबों  में  निहा*   है   ज़िंदगी  का फ़लसफ़ा ये  ख़मोशी  से   बयाँ  करतीं   सदी  का  फ़लसफ़ा बनके ज़ीना* हर बशर को जीना+ सिखलाती क़िताब   इनमें  बातिन* है  बुलंदी की  ख़ुशी  का  फ़लसफ़ा ये  हमेशा  पैदा   करतीं  हैं   सियह   अल्फ़ाज़  से पढ़ने  वालों   के  दिलों  में  रौशनी  का  फ़लसफ़ा  क्या   क़िताबों   से  बड़ा   कोई    यहाँ  उस्ताद  है थाम  कर  उंगली  सिखातीं  रहबरी  का फ़लसफ़ा  हमसफ़र  बन  कर  सफ़र  आसान करती रात का हर  सफ़े  पर  है  चमकता  चाँदनी  का  फ़लसफ़ा इन  क़िताबों  में   हैं  गहरे   इल्म  के   दरिया  कई काश  मुझ  में  हो  हमेशा  तिश्नगी  ...

ग़ज़ल-07 गले मिलीं हैं यहाँ दो ज़बान काग़ज़ पर

गले   मिलीं  हैं  यहाँ  दो  ज़बान  काग़ज़  पर भरे  ये   हिंद   की   उर्दू   उड़ान  काग़ज़  पर  न  मज़हबों   की   है   दीवार   दरमियाँ  कोई कबीर   मीर  का   देखो   बयान   काग़ज़ पर रहीम   वृंद  के   दोहे   हों  या  के  हो  मानस मचा  के  धूम  रखे   कुल  जहान  काग़ज़ पर कहे  हैं  कितने  सवैये  किशन  की  चाहत में अदब की दुनिया में रसखान शान काग़ज़ पर नज़ीर   झूम   रहे    रंग  की   गा  कर  नज़्में है  जायसी  की  अमर  दास्तान  काग़ज़  पर सियासतों  ने  लगायी है  उलझनों की अगन है  बे सबब की बहस  खींचतान  काग़ज़ पर नहीं  है  घर  कोई  बेटी  का  इ...