गले मिलीं हैं यहाँ दो ज़बान काग़ज़ पर
भरे ये हिंद की उर्दू उड़ान काग़ज़ पर
न मज़हबों की है दीवार दरमियाँ कोई
कबीर मीर का देखो बयान काग़ज़ पर
रहीम वृंद के दोहे हों या के हो मानस
मचा के धूम रखे कुल जहान काग़ज़ पर
कहे हैं कितने सवैये किशन की चाहत में
अदब की दुनिया में रसखान शान काग़ज़ पर
नज़ीर झूम रहे रंग की गा कर नज़्में
है जायसी की अमर दास्तान काग़ज़ पर
सियासतों ने लगायी है उलझनों की अगन
है बे सबब की बहस खींचतान काग़ज़ पर
नहीं है घर कोई बेटी का इसलिए देखो
बना रही है वो कितने मकान काग़ज़ पर
ज़मीं पे रहते दिलों में ये 'आरज़ू' जागी
उतार लाना है अब आसमान काग़ज़ पर
-© अंजुमन 'आरज़ू' 22/08/2019
रौशनी के हमसफ़र/2021
ग़ज़ल-07/पृष्ठ क्र• 20
वज़्न -1212 1122 1212 22
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