ख़ल्क़ के पेशवा की आमद है
ख़ातिम-उल-अंबिया की आमद है
रहमतों की ब-हर सू है बारिश
अहमद-ए-मुजतबा की आमद है
जिस ने हम पर हयात की आसाँ
ऐसे मुश्किल कुशा की आमद है
जगमगा उठ्ठा है जहाँ सारा
आज नुरुल-हुदा की आमद है
चाँद शक़ उंगली से किया जिसने
ऐसे मो'जिज़-नुमा की आमद है
जिस पे क़ुरआन का नुज़ूल हुआ
उस हबीबे ख़ुदा की आमद है
क़ल्ब से भेजिए दरूद-ओ-सलाम
सय्यद-उल-अंबिया की आमद है
जिस को मेराज रब ने है बख़्शी
ऐसे कैफ़-उल-वरा की आमद है
क्यों न मसरूर* 'आरज़ू' होगी
मरहबा मुस्तफ़ा की आमद है
मसरूर - आनंदित
-© अंजुमन 'आरज़ू' 29/10/2020
रौशनी के हमसफ़र/2021, पृष्ठ क्र• 16/ ग़ज़ल-03
वज़्न -2122 1212 22/112
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