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03-नअ़त-ए-पाक

ख़ल्क़  के  पेशवा   की   आमद  है 
ख़ातिम-उल-अंबिया की  आमद है

रहमतों  की  ब-हर  सू  है   बारिश
अहमद-ए-मुजतबा  की  आमद है

जिस ने हम पर  हयात की  आसाँ
ऐसे  मुश्किल कुशा  की  आमद है

जगमगा    उठ्ठा   है    जहाँ   सारा
आज  नुरुल-हुदा  की   आमद  है

चाँद शक़ उंगली से  किया जिसने
ऐसे  मो'जिज़-नुमा  की  आमद है

जिस पे क़ुरआन का  नुज़ूल हुआ
उस  हबीबे  ख़ुदा  की  आमद  है 

क़ल्ब से भेजिए दरूद-ओ-सलाम
सय्यद-उल-अंबिया  की आमद है

जिस को मेराज  रब ने है  बख़्शी
ऐसे कैफ़-उल-वरा  की आमद है 

क्यों न  मसरूर*  'आरज़ू'  होगी 
मरहबा  मुस्तफ़ा  की  आमद  है 

मसरूर - आनंदित

 -© अंजुमन 'आरज़ू'    29/10/2020
रौशनी के हमसफ़र/2021, पृष्ठ क्र• 16/ ग़ज़ल-03
वज़्न -2122 1212 22/112

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