शम'अ जुगनू चाँद तारे रौशनी के हमसफ़र
हैं ये कितने माह -पारे* रौशनी के हमसफ़र
जुलमतों से कब ये हारे रौशनी के हमसफ़र
हौसले जब हैं हमारे रौशनी के हमसफ़र
अपनी धीमी सी ज़िया से शब को कर आरास्ता
मह्र* डूबा तो सितारे रौशनी के हमसफ़र
तीरगी में ज़िंदगी की आज़माइश के लिए
करके बैठे हैं किनारे रौशनी के हमसफ़र
नूर के ज़ामिन* ये जुगनू घूमते हैं चार सू
कब रहें हो कर इजारे* रौशनी के हमसफ़र
साज़िशों में हो के शामिल ये हवा के साथ में
कर भी सकते हैं ख़सारे* रौशनी के हमसफ़र
वालदेन और हीरे जैसे,शम्स से उस्ताद अनीस*
हैं मुकम्मल ये इदारे* रौशनी के हमसफ़र
यूँ हुआ महसूस हर शब देख कर जलते चराग़
कर रहे हैं इस्तिख़ारे* रौशनी के हमसफ़र
कैसे रौशन है जहाँ माँ की निदा* से 'आरज़ू'
देख हैराँ हैं ये सारे रौशनी के हमसफ़र
-© अंजुमन 'आरज़ू' 30/11/2020
रौशनी के हमसफ़र/2021
ग़ज़ल-06/ पृष्ठ क्र•19
वज़्न - 2122 2122 2122 212
माह -पारे = सुंदर, मह्र = सूरज, रवि, ज़ामिन = ज़िम्मेदार, इजारे = नियंत्रित, ख़सारे = नुकसान, अनीस = मित्र, इदारे = संस्था, इस्तिख़ारे = भविष्य की विशेष प्रार्थना, निदा = आवाज़
Comments
Post a Comment