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ग़ज़ल-06 शम'अ जुगनू चाँद तारे रौशनी के हमसफ़र

शम'अ  जुगनू   चाँद  तारे   रौशनी  के हमसफ़र
हैं  ये  कितने   माह -पारे*  रौशनी के हमसफ़र 

जुलमतों  से  कब  ये  हारे  रौशनी  के हमसफ़र
हौसले   जब   हैं   हमारे   रौशनी   के हमसफ़र

अपनी धीमी सी ज़िया से शब को कर आरास्ता
मह्र*  डूबा तो   सितारे   रौशनी   के  हमसफ़र 

तीरगी  में   ज़िंदगी  की  आज़माइश  के   लिए
करके  बैठे  हैं   किनारे  रौशनी   के   हमसफ़र

नूर  के ज़ामिन* ये  जुगनू   घूमते   हैं  चार  सू 
कब रहें  हो  कर इजारे*  रौशनी के  हमसफ़र 

साज़िशों में हो  के शामिल ये  हवा के  साथ में
कर भी सकते हैं  ख़सारे* रौशनी के हमसफ़र 

वालदेन और हीरे जैसे,शम्स से उस्ताद अनीस* 
हैं  मुकम्मल  ये   इदारे*  रौशनी  के  हमसफ़र 

यूँ हुआ महसूस हर शब देख  कर जलते चराग़
कर  रहे  हैं  इस्तिख़ारे*  रौशनी  के  हमसफ़र 

कैसे  रौशन है जहाँ माँ  की  निदा* से 'आरज़ू' 
देख   हैराँ   हैं  ये  सारे   रौशनी  के  हमसफ़र 

-© अंजुमन 'आरज़ू'   30/11/2020
रौशनी के हमसफ़र/2021 
ग़ज़ल-06/ पृष्ठ क्र•19
वज़्न - 2122 2122 2122 212 

माह -पारे = सुंदर, मह्र = सूरज, रवि, ज़ामिन = ज़िम्मेदार, इजारे = नियंत्रित, ख़सारे = नुकसान, अनीस = मित्र, इदारे = संस्था, इस्तिख़ारे = भविष्य की विशेष प्रार्थना, निदा = आवाज़

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