आसमाँ पर बादलों की चित्रकारी चिट्ठियाँ
शाम, शब, शबनम, शजर, गुल रब की प्यारी चिट्ठियाँ
ले के आतीं हैं कभी उम्मीद के सूरज कई
या कभी ढलती हुई शामों सी हारी चिट्ठियाँ
रात में तारीक़ियाँ बढ़ने लगीं तो रब ने फिर
चाँद तारे शम'अ सी रौशन उतारी चिट्ठियाँ
दो घड़ी की ज़िंदगी का रोना रोना छोड़ कर
गुल पे शबनम लिख रही है देख प्यारी चिट्ठियाँ
उस शजर की हर हरी पत्ती ये सबसे कह रही
धूप सह कर छाँव की लिक्खी है सारी चिट्ठियाँ
ये परिंदे दे रहे हैं दावतें परवाज़ की
लिख रहे नाज़ुक परों से बारी बारी चिट्ठियाँ
पढ़ सको तो पढ़ के देखो ये ख़ुदा ने ख़ुद लिखीं
हैं निहाँ क़ुदरत के हर मंज़र में न्यारी चिट्ठियाँ
अश्क़ का सैलाब आँखों में मगर देखो ज़रा
'आरज़ू' ने कब लिखीं हैं रब को खारी चिट्ठियाँ
-©अंजुमन 'आरज़ू'
20/09/2019
रौशनी के हमसफ़र/10/2021
ग़ज़ल-10/पृष्ठ क्र• 23
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