Skip to main content

Posts

Showing posts with the label रौशनी के हमसफ़र

ग़ज़ल-15 बस हौसलों से चाहता पहचान परिंदा

बस   हौसलों   से   चाहता   पहचान   परिंदा रखता  है   दिलों  में   यही   अरमान   परिंदा कुछ  दानों के  लालच में  लो  परवाज़ गँवाई अब   बंद  क़फ़स  में   हुआ   नादान  परिंदा रूदाद  सुनी  अर्श  से  तो  फ़र्ज़  समझ  कर अस्मत  के  लिए  चढ़  गया  परवान  परिंदा ग़श खा के गिरा  अर्श से वो  फ़र्श पे ज़ख़्मी फिर कुछ  दिनों का रह गया मेहमान परिंदा तन्हा  था  मगर  रग  में  रवाँ हौसला भी था मरते  हुए   भी  पा   गया   सम्मान   परिंदा जाँ-बाज़ है हिम्मत से जिया ज़ीस्त इसलिए कहला  रहा  है  आज भी  अरहान* परिंदा  अब 'आरज़ू' है ख़ुश कि बिना पंख जहां में परवाज़  ग़ज़ल  भर  रही  उनवान  परिंदा अरहान - राजा -© अंजुमन आरज़ू     11/1...

ग़ज़ल-14 बिन तुम्हारे ये लगे सारी ही महफ़िल तन्हा

बिन  तुम्हारे  ये  लगे  सारी  ही महफ़िल तन्हा चाहिए  कब हमें तुम बिन  यहाँ  मंज़िल तन्हा बे-हुनर  को  मिला  ए'ज़ाज़   बड़े   जलसे में देखता रह  गया फ़न अपना वो क़ाबिल तन्हा क़ामयाबी  में  करे  हर  कोई  रिश्ता   क़ायम सहनी पड़ती है मगर राह  की मुश्किल तन्हा शम्स या शम'अ, क़मर हो कि  बशर हो कोई रौशनी के लिए  जलते सभी तिल तिल तन्हा साथ  जिसने  भी जहाँ  में दिया सच्चाई का रह  गया  वो ही ज़माने के  मुक़ाबिल  तन्हा हौसला   देख  के   हैरान   हुआ   तूफ़ाँ  भी हमने पतवार बिना पा लिया  साहिल  तन्हा लाज़मी  है  कि  ज़रुरत  भी  तवज़्ज़ो पाएँ 'आरज़ू' ही तो फ़क़त है नहीं क़ामिल* तन्हा  क़ामिल - संपूर्ण  -© अंजुमन आरज़ू      01/10/2019 रौशनी के हमसफ़र /2021 ग़ज़ल-14/पृष्ठ क्र• 27  वज़्न -2122  1122  1122  22/112

ग़ज़ल-12 दिल में जो मेरे सच्चा इक़दाम नहीं होता

दिल  में  जो   मेरे  सच्चा   इक़दाम*  नहीं   होता  मंज़िल  न   मिली  होती   इक़राम*   नहीं   होता  जो अज़्म के हामिल हैं  कब  ठहरे  क़दम उनके जब  तक  न ज़फ़र  पा  लें  आराम  नहीं   होता हाक़िम की  हर इक  हाँ में हम भरते अगर हामी  गर्दिश  में   हमारा   फिर  अय्याम*  नहीं   होता  समझाइशें  देते  हैं  जिनको  न  समझ  कुछ भी बातों  के  सिवा  इनको  कुछ  काम  नहीं  होता रूदाद  क़बा*  की कुछ   अच्छी  हैं  अधूरी भी  हर   एक   फ़साने   का   अंजाम   नहीं   होता अल्लाह की मर्ज़ी भी लाज़िम है हर इक शय में सोचे  जो   फ़क़त   इंसाँ  वो  काम  नहीं  होता हालात  के  तू...

ग़ज़ल-11 ज़िंदगी का जैसा भी आग़ाज़ हो

ज़िंदगी    का    जैसा  भी   आग़ाज़  हो ख़त्म यूँ  हो, हम  पे  सब  को   नाज़ हो क्या  गिराएँ साज़िश - ए- दुश्मन  उसे ख़ुद  ख़ुदा जिसका यहाँ अफ़राज़* हो  बातों    में   मिश्री   सी  हो  शीरीनियाँ गुफ़्तग़ू    का   यूँ    मेरी    अंदाज़  हो बिन कहे  तुम  तक  पहुँच  जाए सदा पुर  असर    इतनी  मेरी   आवाज़ हो कुछ   ख़ुसूसी  काम  तो  हैं  लाज़मी चाहे  जितनी  ज़ीस्त  में  ईजाज़* हो  ये   नुमाइश   इश्क़  में  अच्छी  नहीं क्या  ज़रूरी  है  कि यूँ  पर्दाज़*  हो  कब  ज़ियादा  की  है   मेरी 'आरज़ू' बस फ़लक तक ही मेरी परवाज़ हो  अफ़राज़ - बुलंद करने वाला,  ईजाज़ - संक्षिप्तता, पर्दाज़ - प्रदर्शन -© अंजुमन 'आरज़ू'  24/08/2020...

ग़ज़ल-10 आसमाँ पर बादलों की चित्रकारी चिट्ठियाँ

आसमाँ    पर    बादलों    की    चित्रकारी    चिट्ठियाँ शाम, शब, शबनम, शजर, गुल रब की प्यारी चिट्ठियाँ ले   के  आतीं   हैं   कभी   उम्मीद   के   सूरज   कई या   कभी  ढलती   हुई   शामों   सी   हारी   चिट्ठियाँ रात  में   तारीक़ियाँ   बढ़ने   लगीं  तो  रब   ने  फिर चाँद   तारे   शम'अ   सी    रौशन    उतारी   चिट्ठियाँ दो  घड़ी   की  ज़िंदगी   का   रोना  रोना  छोड़  कर गुल  पे  शबनम  लिख  रही  है  देख प्यारी  चिट्ठियाँ   उस  शजर  की  हर  हरी  पत्ती  ये  सबसे  कह रही धूप  सह  कर  छाँव  की  लिक्खी  है सारी चिट्ठियाँ ये  परिंद...

ग़ज़ल-09 जीती तलवार से हर बार क़लम की ताक़त

जीती  तलवार  से   हर  बार  क़लम  की  ताक़त जीत   के  पहने   गले   हार   क़लम  की  ताक़त पाठ   गीता  का   पढ़ाती  है   कभी   अर्जुन को रोकती   है   कभी  तक़रार   क़लम  की  ताक़त बुद्ध  का  ज्ञान  शरण  संघ   पिटक  में   भरकर हाँ  बदल  सकती  है  संसार  क़लम  की ताक़त सूर   रसखान   की   वाणी  में   संग   राधा   के गा  रही  कृष्ण  का  सिंगार  क़लम  की  ताक़त ओज  में  डूब  के  भूषण  की  क़लम  गाती  है सबको करती है  ये हुशियार  क़लम की ताक़त ये   जहालत   के   समुंदर   से   बचा  लेती  है बनके  मँझधार में  पतवार  क़लम...

ग़ज़ल-06 शम'अ जुगनू चाँद तारे रौशनी के हमसफ़र

शम'अ  जुगनू   चाँद  तारे   रौशनी  के हमसफ़र हैं  ये  कितने   माह -पारे*  रौशनी के हमसफ़र  जुलमतों  से  कब  ये  हारे  रौशनी  के हमसफ़र हौसले   जब   हैं   हमारे   रौशनी   के हमसफ़र अपनी धीमी सी ज़िया से शब को कर आरास्ता मह्र*  डूबा तो   सितारे   रौशनी   के  हमसफ़र  तीरगी  में   ज़िंदगी  की  आज़माइश  के   लिए करके  बैठे  हैं   किनारे  रौशनी   के   हमसफ़र नूर  के ज़ामिन* ये  जुगनू   घूमते   हैं  चार  सू  कब रहें  हो  कर इजारे*  रौशनी के  हमसफ़र  साज़िशों में हो  के शामिल ये  हवा के  साथ में कर भी सकते हैं  ख़सारे* रौशनी के हमसफ़र  वालदेन और हीरे जैसे,शम्स से उस्ताद अनीस*  हैं  मुकम्मल  ये   इदारे*  रौशनी...

ग़ज़ल-05 -मुझे गर वक़्त अव्वल लिख रहा है

मुझे  गर   वक़्त  अव्वल    लिख   रहा  है मेरे  वालिद  को  अफ़ज़ल   लिख  रहा  है मेरा    किरदार   उनका   नारियल - दिल बड़ी   सख़्ती  से   कोमल   लिख  रहा  है मेरे   अब्बा   की  रूदाद -ए - मशक्कत पुराना    एक    पीपल    लिख    रहा   है है  जो  रोज़ी  की   छागल   पास   उनके मेरा  दिल  उसको  बादल   लिख  रहा है मेरे   वालिद  की   मेहनत   का   पसीना मुअत्तर   एक    संदल    लिख   रहा   है जो  मुझ में  है  उन्हीं  सा  इक  जियाला सरल मुश्किल को  हर पल लिख रहा है अधूरी    'आरज़ू'   को   अज़्म   उनका मुनव्वर  और   मुकम्...