Skip to main content

ग़ज़ल-09 जीती तलवार से हर बार क़लम की ताक़त

जीती  तलवार  से   हर  बार  क़लम  की  ताक़त
जीत   के  पहने   गले   हार   क़लम  की  ताक़त

पाठ   गीता  का   पढ़ाती  है   कभी   अर्जुन को
रोकती   है   कभी  तक़रार   क़लम  की  ताक़त

बुद्ध  का  ज्ञान  शरण  संघ   पिटक  में   भरकर
हाँ  बदल  सकती  है  संसार  क़लम  की ताक़त

सूर   रसखान   की   वाणी  में   संग   राधा   के
गा  रही  कृष्ण  का  सिंगार  क़लम  की  ताक़त

ओज  में  डूब  के  भूषण  की  क़लम  गाती  है
सबको करती है  ये हुशियार  क़लम की ताक़त

ये   जहालत   के   समुंदर   से   बचा  लेती  है
बनके  मँझधार में  पतवार  क़लम  की ताक़त

गुल खिलाती है सदा प्यार के गुलशन गुलशन
दूर  नफ़रत  के  करे  ख़ार  क़लम  की ताक़त

'आरज़ू' को यही  लायी  है  मुक़ाबिल  सबके
है  निराधार  की  आधार  क़लम  की  ताक़त

-© अंजुमन 'आरज़ू'  
रौशनी के हमसफ़र/2021
ग़ज़ल-09/पृष्ठ क्र• 22

Comments

Popular posts from this blog

गरीबी गौरव गान

गरीबी  तो गौरव गान है । इसका बहुत सम्मान है । शबरी सा धीरज धर  के, कुछ तप भी करना पड़ता है । आस प्रभु की मन भरके, जग से लड़ना पड़ता है । तब बेर खाते श्री राम है ।। इसका बहुत सम्मान ह...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते, सब निर्णय तुम खुद बुन लेते । मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं, *कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥* मेरा हर सृंगार तुम्ही से , बिछुए कंगन हार तुम्ही से । फिर भी मुझको भेज ...