ख़ुश्बू-ए-सुख़न का ख़ुश गवार झोंका – अंजुमन ‘आरज़ू’
अंजुमन ‘आरज़ू’ जी का पहला शेरी मज्मूआ जिसका उनवान है 'रौशनी के हमसफ़र’आपकी महब्बतों के हवाले करना मेरे लिए बायस-ए-फ़ख्र और पुर-ख़ुलूस अहसास है। इसकी इशाअत पर मैं आपको दिली मुबारक़बाद देता हूँ। किसी भी शाइर को आप उसको सुन कर पढ़ कर समझ सकते हैं, लिहाजा अंजुमन ‘आरज़ू’ साहिबा की शाइरी से आप इस मज्मूए के मार्फ़त वावस्ता हो रहे हैं तो उनके कलाम को पढ़ते हुए आप महसूस करेंगे कि शाइरा ने नए और निखरे हुए अंदाज़ को अपनी शाइरी में न सिर्फ़ चुना है वल्कि ख़ूबसूरती से निभाया भी है, ये अहसास मुसलसल आपके ज़ह्न और दिल को अपनी आगोश में लिए रहता है और शाइरा की कुव्वत-ए-गोयाई की तस्दीक भी करता है । मिसाल के तौर पर शेर मुलाहिज़ा फ़रमाएँ -
जिन्हें हसरत हो बादल की वो पहले धूप तो चख लें
अगर है छाँव की ख़्वाहिश तो जलना भी ज़रूरी है
है समुंदर में भी मिठास कोई
तब तो दरिया को प्यास लगती है
टूटे हैं आज सच्ची मुहब्बत के सब भरम
ग़ुरबत कुछ एक रोज़ यूँ आने का शुक्रिया
लहजे की नज़ाकत के साथ तस्वीरी सिफ़त वाले अशआर बहुत ही ख़ूबसूरती से बयाँ हुए हैं जिन की मंज़रकशी शाइरी के मक़सद को पूरा करती है और शेर-ओ-सुख़न के चाहने वालों के सामने ग़ज़ल दर ग़ज़ल शाइरी के पैकर से नज़र आते हैं -
कहते रहे हैं पीर ज़रा सब्र से लो काम
ताउम्र रही कब है कोई पीर हमेशा
बदल के इस्म वो पढ़ता है जो सर-ए-महफ़िल
हमें पता है ये उम्दा कलाम किसका है
आपकी ग़ज़लिया शाइरी को किसी एक रंग के आईने मे महदूद नहीं किया जा सकता आपने ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ पहलुओं को अपना मौज़ू-ए-सुख़न बनाया है ज़बान और बयान के लिहाज़ से देखें तो आपकी शाइरी में दीन-ओ-ईमान की बात है तो रवायती मौज़ूआत के इतर दुनिया के मसाईल से भी आप बेख़बर नहीं है -
आज रखने लगा वो मेरे निवालों पे नज़र
तिश्नगी सहके कभी आब पिलाया था जिसे
सभी किरदार ज़िंदा हैं यहाँ गोदान के अब भी
कहें किससे ये क़िस्सा ही किसानों की हक़ीक़त है
अंजुमन ‘आरज़ू’ साहिबा ख़ुद मानती हैं कि ग़ज़ल फ़क़त क़ाफ़िया पैमाई और बह्र निभाने का नाम नहीं है बल्कि शाइरी में ज़िंदगी के तज्रिबात और मआशरे के गिर्द-ओ-पेश के हालात को लेकर चलना भी ज़रूरी है और ये काम आपने बख़ूबी अंजाम दिया है । इसका सबब हस्सास तबीअत और अहसास की शाइस्तगी के साथ-साथ फ़ितरत मे आला दर्जे की इंकिसारी भी है जिसने उनके ख़याल को एक नई ज़िया अता की है। आप पेशे से एक शिक्षक हैं और इल्म अता करने का पेशा जब एक शाइरा के साथ जुड जाता है तो अहसास-ओ-अफ़्कार की तर्जुमानी एक सुख़नवर ही इस तरह कर सकता है –
ताक़ में रख दो रुकावट और फिर
बिन थके बस चलते जाना सीख लो
मंज़िलों की तलाश में अक्सर
करना पड़ता है तय सफ़र तन्हा
बस उन्हीं को है मयस्सर ये सुकूँ की छाँव भी
ज़िंदगी की धूप में जिनको निकलना आ गया
क़लाम-ए-आरज़ू को छूते हुए हम अपने आप से क़रीबतर होते जाते हैं। जिस तरह रो लेने के बाद जी हल्का हो जाता है उसी तरह अंजुमन ‘आरज़ू’ साहिबा के बहुत से अशआर इसी कैफ़ियत के नज़र आते हैं कि उनको पढ़ लेने के बाद बस उसी शेर पर ठहर कर उसी के हो कर रह जाते हैं -
मिलना नहीं नसीब में लेकिन दबी हुई
है दिल में सिर्फ उसके नज़ारों की आरज़ू
बिछड़ते हुए मेरे लब पे तबस्सुम
ज़रा देख तो इक नज़र जाने वाले
ग़ज़ल सिर्फ़ प्यार महब्बत का ही ज़रीआ नहीं है बल्कि जीवन के हर उलझे हुए फ़लसफ़े, हर पहलू के बयान का ज़रीआ है, यही वजह है कि अंजुमन ‘आरज़ू’ की शाइरी फ़क़त जिंसियात तक ही महदूद नहीं है बल्कि उसमें ग़ज़ल का रवायती रंग है तो जदीद ख़याल भी है बहुत से अशआर में तसव्वुफ़ का रंग भी उभर कर सामने आता है और सामईन को गहरी संवेदना से भर देता है -
ग़म में भी ढूंढ ली ख़ुशी मैंने
ये हुनर उसकी ही इनायत है
लाख बेचैनियाँ सही लेकिन
उसके एहसास से ही राहत है
मैं चाँहू तो इस शेरी मज्मूए से बहुत से अशआर आपकी ख़िदमत मे पेश कर सकता हूँ जो अंजुमन ‘आरज़ू’ साहिबा की शाइरी के मुख़्तलिफ़ रंग से आपको सरशार कर देंगे मगर मैं चाहता हूँ कि ये इंतिख़ाब आप ख़ुद करें, और मौजूआत के बदलते हुए तेवर को ख़ुद महसूस करें, ये तहरीर मंज़िल का पता देने के लिए काफ़ी होगी। मेरी इस मश्क़ से ये शेरी मज्मूआ आप पर वरक़ दर वरक़ खुल कर आपको लुत्फ़ अंदोज़ करेगा, अंजुमन ‘आरज़ू’ साहिबा की शाइरी को पढ़ने का नया जाविया आपको समझ आए तो अपनी कोशिश कामयाब समझूँगा ।
बहुत ही कम वक़्त में आपने शाइरी में एक आ'ला मकाम हासिल किया है आप तख़्लीक़ी ऐतबार से रवां दवां और सरगर्म हैं, शाइरी के मैदान में आप मुसलसल अपने जौहर दिखला रही हैं तो उम्मीद की जा सकती है कि नक़्श -ए-सानी की इशाअत में ज़ियादा वक़्त नहीं लगेगा । फ़िलहाल तो रौशनी के हमसफ़र उनवान से आपकी बेहतरीन काविशात को आपके हवाले करते हुए इंतिहाई ख़ुशी महसूस कर रहा हूँ , न केवल इस भूमिका लिखने के लिये बल्कि ग़ज़लों पर मुसलसल तबादला-ए-ख़यालात के दौरान (जिसे मेरे मना करने के बावजूद भी वो इस्लाह कहती हैं ) मुझे जो इज़्ज़त आरज़ू साहिबा ने बख़्शी है उसके लिये आपका दिली शुक्रिया अदा करता हूँ, आपकी इंकिसारी बेमिसाल है । ये शेरी मज्मूआ आपको पेश करते हुए दुआ करता हूँ कि इल्म-ओ-अदब में आप का मर्तबा और वसी'अ हो, रौशनी के हमसफ़र मंज़र-ए-आम पर कामयाबी की मिसाल बने । आमीन !!!
रवि शुक्ल
ग्राम पोस्ट- उदामर, जिला -बीकानेर
पिन 334022 राजस्थान
9024323219
रौशनी के हमसफ़र
पृष्ठ 4 से7 तक
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