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इंतिसाब (समर्पण)


     "रौशनी की उन सभी आवाज़ों की नज़्र", जिन्हें सुनकर मेरी ज़िंदगी का सफ़र इल्म के नूर से रौशन हो सका....
असातीज़ा, वालदेन, भाई-बहन, अहबाब और...
 ख़ास तौर पर, "माँ" की नज़्र..... जिनकी आवाज़ की तनवीर से मेरी तीरगी-सी ज़ीस्त, ताबिंदा हो सकी ।


रौशनी के हमसफ़र, पृष्ठ 3
अंजुमन 'आरज़ू'

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