पेश-लफ़्ज़
अल्लाह के फ़ज़ल-ओ-करम और बुज़ुर्गों की दुआओं से शे'री मजमूआ "रौशनी के हमसफ़र" आपके पेश-ए-नज़र है ।
मैंने क़ाफ़िया पैमाई की कोशिश अपने ख़ाली वक़्त को क़ीमती बनाने के लिए शुरूअ की थी, वह कोशिश ग़ज़ल हुई या नहीं, यह कह पाना मेरे लिए मुमकिन नहीं है और जो बात मुमकिन ही नहीं उस पर अल्फ़ाज़ क्या ज़ाया करना । इससे बेहतर यह है कि वह बात की जाए जो निस्बतन इससे अहम है और जिसके बिना यह "पेश-लफ़्ज़" मुकम्मल भी नहीं होगा ।
हालांकि हमारे घर के छोटे से कुतुब ख़ाने में मीर-ओ-ग़ालिब , दाग़-ओ-मोमिन, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़, निदा फ़ाज़ली, गुलज़ार, मीना कुमारी 'नाज़', परवीन शाकिर वगैरह मेयारी शाएरात व शो'अरा के दीवान और शे'री-मजमूए व अरूज़ की चंद कुतुब हैं लेकिन इन्हें पढ़ पाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था ।अदब की तरफ़ माइल तो मैं बचपन ही से थी लेकिन पढ़ने लिखने की कुछ दिक़्क़तों की वजह से शुरुआत काफ़ी देर से हुई । नई ईजाद ने एंड्रॉयड प्लेटफॉर्म पर पढ़ पाना मेरे लिए कुछ आसान किया, क्योंकि यहाँ मैं सब कुछ सुन सकती हूँ । सो ग़ज़ल सीखने की शुरुआत इंटरनेट से कुछ म'आलूमात इकट्ठा कर, मुहतरम जनाब हीरालाल यादव 'हीरा' जी की ग़ज़लात पर लिखे वज़्न को समझ कर की, जिनकी मैं ममनून-ओ-मशकूर हूँ । ख़ुशक़िस्मती से इसी दौरान 2019 में मजाज़ी दुनिया में ही मुहतरम जनाब रे शीन बीकानेरी जी से मुलाक़ात हुई जिन के कलंदर-किरदार से मैं बेहद मुतअस्सिर हुई और कुछ वक़्त बाद उनसे इस्लाह लेने लगी । आपने बड़े ख़ुलूस से न सिर्फ मेरी ग़ज़लात की इस्लाह की और ज़बान की बारीकियों के बारे में बताया बल्कि बर-वक़्त मेरी हौसला अफ़ज़ाई भी करते रहे ।आपकी रहनुमाई में ही मैं इस सफ़र के पहले पड़ाव तक पहुंच सकी हूँ ।
जिस तरह मैं अपने वालदेन और भाई-बहन का शुक्रिया अदा नहीं कर सकती उसी तरह उस्ताद मुहतरम जनाब रवि शुक्ल (रे शीन बीकानेरी) जी का भी अपने अल्फ़ाज़ के ज़रिए तशक्कुर अदा कर पाना मेरे लिए नामुमकिन है ।
सच यही है कि यह किताब मेरी ग़ज़ल सीखने की कोशिशों का ख़ूबसूरत नतीजा है । सीखने की इस कोशिश में बाज़ दफ़ा मुहतरम जनाब समर कबीर साहब और मुहतरम जनाब अनीस शाह 'अनीस' भाई से भी बेशक़ीमती इस्लाह मिलती रही जिनकी ममनून-ओ-मशकूर हूँ । बग़ैर तनक़ीद न कोई फ़राज़ हो सकता है और न सरफ़राज़ । इसीलिए मैं मुहतरम जनाब अनीस शाह 'अनीस' भाई साहब का अज़-हद तशक्कुर अदा करती हूँ जिन्होंने अपना बेश-क़ीमती वक़्त निकालकर मेरी कोशिशों को एक माहिर नक़्क़ाद की तरह अपनी तनक़ीदी नज़र से छूकर मुझे मुतमइन किया । दौर-ए-आख़िर नुक़्ते वगैरह दुरुस्त करने के लिए भाई सारिक ख़ान 'साहिल' की भी ममनून हूँ ।
आख़िर में मैं उन सभी अहबाब की शुक्रगुज़ार हूँ जिन्होंने किसी न किसी सूरत में मेरी इस किताब को मंज़र-ए-आम तक पहुंचाने में मदद की है । चूँकि "रौशनी के हमसफर" मेरी ग़ज़ल की शुरुआती कोशिशों का नतीजा है तो फ़ितरतन कुछ अरूज़ी ग़लतियाँ भी हुई होंगी, जो तमाम कोशिशों के बाद भी रह गई होंगी, जिनके लिए मैं माज़रत ख़्वाह हूँ । दुआ गो हूँ कि आप इन्हें नज़रअंदाज़ कर मुझे अपनी मुहब्बतों से नवाज़ेंगे । आपकी यही दुआएँ मेरे इस शे'री सफ़र की आगे की राह रौशन करेंगी । उम्मीद है कि मेरी इस किताब को आप पसंद करेंगे, जो अब आपकी है ।
अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'
जाम मार्ग उमरानाला
छिंदवाड़ा म• प्र•
पिन 480107
मो• नं• 9098902567
रंशनी के हमसफ़र
पृष्ठ 8 से 9
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