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हम्द-02 रब के बंदों से की महब्बत है

रब    के   बंदों  से   की  महब्बत  है
अपनी  तो    बस   यही   इबादत  है

सारी   तारीफ़   है   ख़ुदा   के   लिए
जिसकी  दोनों  जहाँ  में  अज़मत है

फूल     पत्तों    में    बेल    बूटों   में
देखिए   रब   की   ही    इबारत   है

शुक्र है  रब का  जो दिया  सो दिया
अपनी क़िस्मत से कब शिकायत है

ये   नमाज़ें    ज़कात    हज    रोज़े
रब  को   पाने  की  ही   रवायत  है

ग़म  में  भी   ढूंढ  ली   ख़ुशी   मैंने
ये   हुनर   उसकी  ही   इनायत  है

लाख    बेचैनियाँ    सही    लेकिन
उसके   एहसास  से  ही   राहत है

जिसके  दिल में  हो  नूर  ईमाँ का
कब  उसे  तीरगी  से   दहशत  है

'आरज़ू'  ख़ल्क़* से   लड़ी तन्हा 
रब के दम से ही  सारी हिम्मत है

ख़ल्क़ - संसार, लोक समूह

 -© अंजुमन 'आरज़ू'   14/12/2019
रौशनी के हमसफ़र /2021, पृष्ठ क्र• 15
 वज़्न -2122 1212 22/112

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