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ग़ज़ल-08 इन क़िताबों में निहा* है ज़िंदगी का फ़लसफ़ा

इन  क़िताबों  में  निहा*   है   ज़िंदगी  का फ़लसफ़ा
ये  ख़मोशी  से   बयाँ  करतीं   सदी  का  फ़लसफ़ा

बनके ज़ीना* हर बशर को जीना+ सिखलाती क़िताब  
इनमें  बातिन* है  बुलंदी की  ख़ुशी  का  फ़लसफ़ा

ये  हमेशा  पैदा   करतीं  हैं   सियह   अल्फ़ाज़  से
पढ़ने  वालों   के  दिलों  में  रौशनी  का  फ़लसफ़ा 

क्या   क़िताबों   से  बड़ा   कोई    यहाँ  उस्ताद  है
थाम  कर  उंगली  सिखातीं  रहबरी  का फ़लसफ़ा 

हमसफ़र  बन  कर  सफ़र  आसान करती रात का
हर  सफ़े  पर  है  चमकता  चाँदनी  का  फ़लसफ़ा

इन  क़िताबों  में   हैं  गहरे   इल्म  के   दरिया  कई
काश  मुझ  में  हो  हमेशा  तिश्नगी   का  फ़लसफ़ा

सूफ़ियाना   दिल   की   मेरे   अब  यही  है 'आरज़ू'
ज़िंदगी  भर   मैं   निभाऊँ   सादगी  का  फ़लसफ़ा 

निहाँ - छिपा हुआ, ज़ीना - सीढ़ी, जीना - जीवन, बातिन - छिपा हुआ

 -© अंजुमन 'आरज़ू'  04/09/2019
रौशनी के हमसफ़र/2021
ग़ज़ल-08/पृष्ठ क्र• 21 
वज़्न -2122 2122 2122 212

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