इंद्रधनुष छाये गगन,खिले धरा का रूप ।
कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारुप ॥
इंद्रधनुष सा नेह तो, सतरंगी संसार ।
रंग मिलें मिलकर सजें, पायें रूप अनूप ॥
कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारूप ॥
एक से दूजा यूँ जुड़ा, इंद्रधनुष पहचान ।
आकर्षण हे साथ में, बिछड़े रूप कुरूप ॥
कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारूप ॥
इंद्रधनुष में सात हैं, जीवन रंग हजार ।
जो सब धीरज से सहे, वही रंग का भूप ॥
कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारूप ॥
सुख दुख दोनों ही मिलें, जीवन पथ में साथ ।
इंद्रधनुष बनता तभी, संग घटा के धूप ॥
कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारूप ॥
आशा और उमंग से, इंद्रधनुष के रंग ।
आशा बिन जीवन लगे, अंधकार का कूप ॥
कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारूप ॥
इंद्रधनुष छाये गगन, खिले धरा का रूप ।
कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारूप ॥
रचना तिथि 23/03/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र
साहित्य सागर
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