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'कविता' पर कविता

ये जीवन एक कविता सा या कविता है ये जीवन सी ।
कभी तो मुक्त बहती है कभी छंदों के बंधन सी ।

मुझे जीवन की कविता का सदा हर रूप भाता है ।
कभी ग़म की चुभन गाती कभी खुशियों के गायन सी ॥

उड़ाने कल्पना की भर के वापस लौट आती है ।
कभी ये मेघदूतम सी कभी वेदों के वाचन सी ॥

युगों के बाद भी कविता दिलों में राज करती है ।
कभी ग़ालिब की ग़ज़लों सी कभी मीरा के मोहन सी ॥

रगों में ख़ून बन कर बह रही है अब यही सरिता ।
बसी है 'आरज़ू' के मन में कविता देख धड़कन सी ॥

रचना तिथि 21/03/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
    -सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू' ✍
छिंदवाड़ा मप्र

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