1- ईर्ष्या
कालकूटी है ईर्ष्या, करें हृदय जो वास ।
औरों से पहले सुनो, निज का होता नास ॥
अग्नि सी है ये ईर्ष्या, पल पल जलती जाय ।
जीवन के सब धन जले, हाथ न कुछ भी आय ॥
2- द्वेष
गरल पिये जग हित शिवा, हुए श्वेत से नील।
हर* जग के सब द्वेष हर*,भरो हृदय में शील ॥
द्वेष भरा मन मे मगर, बोलें मीठे बोल ।
अमृत से विश्वास में, विष देते हैं घोल ॥
3- प्रेम
प्रीतम है इमरोज़ सा, व्यापक दृष्टिकोण ।
साहिर देखो बन गया, सुंदर प्रेम त्रिकोण ॥
श्रम है मोती कर्म का, श्रम जीवन का मूल ।
श्रम से प्रेम करो सदा, श्रम पूजा के फूल ॥
4- आलिंगन
आलिंगन आतुर हुई, जरद शरद की धान ।
हरि सा चुन के वर कृषक, कर दे कन्या दान ॥
बेल विटप को देखकर, मुस्काती है मंद ।
पुष्प भ्रमर से पा रहे,आलिंगन मकरंद ॥
5- घात
घात लगा कर बैठते, करते हैं आघात ।
गैरों की हम क्या कहें, है अपनों की बात ॥
धात लगाने से सदा, खाना बहतर घात ।
तुम ईश्वर पर छोड़ दो, वही करें प्रतिघात ॥
रचना तिथि 13/032019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र
Excellent commendsble poetry
ReplyDeleteCongratulations