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हम्द 01 - ज़िक्र-ए-हक़ सुब्ह-ओ-शाम होता है

ज़िक्र-ए-हक़  सुब्ह-ओ-शाम  होता है
विर्द    रब    का     क़लाम    होता  है

वो  जो   रब   का   गुलाम    होता  है
उसका    आला    मक़ाम     होता  है

आब आतिश फ़लक ज़मीन-ओ-हवा
सब   पे   उसका   निज़ाम   होता  है

शम्स   ढलते   ही   चाँद  से  शब  में
नूर      का     इंतज़ाम      होता    है

वो   नुमायाँ   वही   निहाँ  हर  सिम्त
उसका   हर   सू   क़याम    होता  है

दिल   में  रब  का  ख़याल  आते ही
ज़ीस्त   का   ग़म   तमाम   होता है

'आरज़ू'   हो  जिसे   फ़क़त  रब से
क़ाबिल -ए - एहतराम   होता  है
             
 -© अंजुमन 'आरज़ू'   31/07/2020
रौशनी के हमसफ़र /2021, पृष्ठ क्र• 14
वज़्न -2122 1212 22/112

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