Skip to main content

शम्'अ रोशन कर दी हमने

वज़न- 2122 2122 2122 212

ग़ज़ल

शम्'अ रोशन कर दी हमने तीरगी के सामने ।
टिक ना पाएगा अंधेरा रोशनी के सामने ॥

बिन थके चलते रहे गर मंजिलों की चाह में ।
हार जाती मुश्किलें भी आदमी के सामने ॥

पर्वतों से हौसलों को देखकर हैरान है ।
आसमां भी झुक गया है अब जमीं के सामने ॥

आबे जमजम चूमता है एड़ियों को तिफ़्ल की ।
हार कर बहता है चश्मा तिश्नगी के सामने ॥

रोज़ हों रोज़े हों चाहे या के हो कोई नमाज़ ।
मां की खिदमत है बड़ी हर बंदगी के सामने ॥

मैंने माना तू बड़ा है प्यासा रखता है मगर ।
ए समंदर तू है छोटा मुझ नदी के सामने ॥

खूबियों से भी नवाजा 'आरज़ू' अल्लाह ने ।
फिर भला क्यों हार जाऊं इक कमी के सामने ॥

      -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
23/05/2019

Comments

Popular posts from this blog

गरीबी गौरव गान

गरीबी  तो गौरव गान है । इसका बहुत सम्मान है । शबरी सा धीरज धर  के, कुछ तप भी करना पड़ता है । आस प्रभु की मन भरके, जग से लड़ना पड़ता है । तब बेर खाते श्री राम है ।। इसका बहुत सम्मान ह...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते, सब निर्णय तुम खुद बुन लेते । मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं, *कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥* मेरा हर सृंगार तुम्ही से , बिछुए कंगन हार तुम्ही से । फिर भी मुझको भेज ...