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      हमारी भारतीय संस्कृति बड़ी ही दूरदर्शी और वैज्ञानिक है। भारतीय मनीषियों ने बहुत पहले ही यह जान लिया था, कि पेड़ों का मनुष्य जाति के लिए क्या महत्व है, इसीलिए एक पेड़ को पालना 10 पुत्रों को पालने के बराबर कहा गया था । इस महत्वपूर्ण वैज्ञानिक तथ्य को लोग अधिक से अधिक माने, इसलिए इसे आस्था से जोड़ दिया गया, और परिणाम भी काफी सुखद रहा । बहुत लंबे समय तक हम अपने बरगद, पीपल, तुलसी, आंवला,आम आदि को बचा सके ।किंतु आधुनिकता की अंधाधुंध दौड़ में भागते हुए, हमने अपनी वैदिक ऋचाओं को विसार दिया है । जिसका दुष्परिणाम वर्तमान में हम, प्राकृतिक त्रासदी के रूप में भोग रहे हैं, और यदि समय रहते ना चैते, तो आगे भी हमारी पीढ़ियां इसके भयावह परिणाम भोगेगी ।
     निसंदेह घटे पेड़ों से जीव जंतुओं के साथ हैं मानव जाति की सांसें भी घटती जा रही है । पहले मनुष्य शतायु हुआ करता था, किंतु उसने जैसे जैसे स्वयं को पेड़ों से प्रकृति से दूर किया, वह रोगी हो गया, और उसकी आयु घटती  गई ।
     इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए हमें चाहिए, कि हम पुनः अपनी वैदिक संस्कृति की ओर लौट चलें।कुछ विदेशी संस्कृतियँ, जो कि अपनी संकीर्ण, या पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण के कारण, हमारी संस्कृति को अंधविश्वास कहते हैं उन्हें नकारे....
    स्वयं जागृत हूं तथा औरों को भी जगाएं।

        -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

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