भूल कर सच्चाइयाँ परछाइयों में खो गया
ये ज़माना आज कल चतुराइयों में खो गया
आम की जो बन्द बोतल देखी कल बाज़ार में
मेरा मन बचपन की उन अमराइयों में खो गया
पोंछकर अश्कों के मोती कर ही दी बेटी विदा
इक पिता का दर्दो - ग़म शहनाइयों में खो गया
पी चुका कितनी नदी पर तिश्नगी बुझती नहीं
ये समंदर प्यास की गहराइयों में खो गया
नफ़रतों की इस तपिश से अब घुटन होने लगी
प्यार का एहसास भी पुरवाइयों में खो गया
लाज़मी है चलते रहना मंजिलों के वास्ते
थक के जो बैठा यहाँ गुमनामियों में खो गया
आख़िरत के वास्ते सारी इबादत भूल कर
तू भी तो दुनिया की इन रअनाइयों में खो गया
- अंजुमन 'आरज़ू'©✍
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