Skip to main content

कह मुकरी

कह मुकरी

रात दिना वो मो संग डोले
हौले हौले प्यार से बोले
आज रिसा कर मारे कोहनी
क्यों सखि साजन ? न सखि फोनी ।

उस बिन मेरा मन अकुलाता
देख उसे चेहरा खिल जाता
सुबह शाम दोपहरी भाय
क्यों सखि साजन ? न सखि चाय ।

प्यास बुझाए जो तन मन की
उस बिन सोचूँ ना जीवन की
जुड़ी उसी संग मेरी कहानी
क्यों सखि साजन ? न सखि पानी ।

उस दिन लगता कुछ न सुहाना
बिल्कुल भी ना भाए खाना
फीका उसके आगे कनक
क्यों सखि साजन ? न सखि नमक ।

उस बिन जीवन न जी पाऊँ
मरकर गोद उसी की पाऊं
सुबह उसे उठ चुम्मा करती
क्यों सखि साजन ? न सखि धरती ।

      -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
05/05/2019

Comments

Popular posts from this blog

गरीबी गौरव गान

गरीबी  तो गौरव गान है । इसका बहुत सम्मान है । शबरी सा धीरज धर  के, कुछ तप भी करना पड़ता है । आस प्रभु की मन भरके, जग से लड़ना पड़ता है । तब बेर खाते श्री राम है ।। इसका बहुत सम्मान ह...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते, सब निर्णय तुम खुद बुन लेते । मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं, *कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥* मेरा हर सृंगार तुम्ही से , बिछुए कंगन हार तुम्ही से । फिर भी मुझको भेज ...