Skip to main content

ग़ज़ल

पुराने रास्तों पे चलके देखती हूँ ।
गिरूँ तो भी संभल के देखती हूँ ॥

चलूँ फिर आँख को सपनों से भर लूँ ।
खुद ही को फिर से छल के देखती हूँ ॥

मेरी किस्मत में क्या लिक्खा है उसने ।
मैं अपने हाथ को मल के देखती हूँ ॥

तरस खाकर वो दे दे खुशी-खिलौना ।
खुदा के सामने मचल के देखती हूँ ॥

मेरी जागीर है कुछ कोरे पन्ने ।
जिन्हें मानिंद गजल के देखती हूँ ॥

सभी को जिंदगी देने की खातिर ।
चलो सूरज सा जल के देखती हूँ ॥

पुराने रास्तों पे चलके देखती हूँ ।
गिरूँ तो भी संभल के देखती हूँ ॥

       -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

Comments

Popular posts from this blog

गरीबी गौरव गान

गरीबी  तो गौरव गान है । इसका बहुत सम्मान है । शबरी सा धीरज धर  के, कुछ तप भी करना पड़ता है । आस प्रभु की मन भरके, जग से लड़ना पड़ता है । तब बेर खाते श्री राम है ।। इसका बहुत सम्मान ह...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते, सब निर्णय तुम खुद बुन लेते । मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं, *कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥* मेरा हर सृंगार तुम्ही से , बिछुए कंगन हार तुम्ही से । फिर भी मुझको भेज ...