पुराने रास्तों पे चलके देखती हूँ ।
गिरूँ तो भी संभल के देखती हूँ ॥
चलूँ फिर आँख को सपनों से भर लूँ ।
खुद ही को फिर से छल के देखती हूँ ॥
मेरी किस्मत में क्या लिक्खा है उसने ।
मैं अपने हाथ को मल के देखती हूँ ॥
तरस खाकर वो दे दे खुशी-खिलौना ।
खुदा के सामने मचल के देखती हूँ ॥
मेरी जागीर है कुछ कोरे पन्ने ।
जिन्हें मानिंद गजल के देखती हूँ ॥
सभी को जिंदगी देने की खातिर ।
चलो सूरज सा जल के देखती हूँ ॥
पुराने रास्तों पे चलके देखती हूँ ।
गिरूँ तो भी संभल के देखती हूँ ॥
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
Comments
Post a Comment