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ग़ज़ल

पुराने रास्तों पे चलके देखती हूँ ।
गिरूँ तो भी संभल के देखती हूँ ॥

चलूँ फिर आँख को सपनों से भर लूँ ।
खुद ही को फिर से छल के देखती हूँ ॥

मेरी किस्मत में क्या लिक्खा है उसने ।
मैं अपने हाथ को मल के देखती हूँ ॥

तरस खाकर वो दे दे खुशी-खिलौना ।
खुदा के सामने मचल के देखती हूँ ॥

मेरी जागीर है कुछ कोरे पन्ने ।
जिन्हें मानिंद गजल के देखती हूँ ॥

सभी को जिंदगी देने की खातिर ।
चलो सूरज सा जल के देखती हूँ ॥

पुराने रास्तों पे चलके देखती हूँ ।
गिरूँ तो भी संभल के देखती हूँ ॥

       -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

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