लघु कथा 🏆
शासकीय सेवा मे आगे के बाद, श्रेया आज पहली बार अपने मामाजी के घर आई थी । उसे भौतिक रूप से तो कुछ नया ना लगा,सब कुछ पहले जैसा ही तो था । पर,,,,,,,,ये क्या हुआ, ,,,,,,,,,, कि वह अवाक् रह गयी !!!
पुरुष प्रधान समाज में आज भी ऐसा होता है कि जब कुर्सियाँ सोफे आदि कम पड़ जाते हैं, तो महिलाएँ ही जमीन पर चटाई डाल कर नीचे बैठतीं हैं । प्रारम्भिक औपचारिकताओं के बाद माँ और श्रेया जब अंदर गयीं तो आदतन,नीचे जमीन पर बिछी चटाई पर बैठने लगीं ।तभी अचानक,मामाजी की अप्रत्याशित किन्तु हर्षाती हुई आवाज आई-" अरे श्रेया बेटी! तुम वहाँ कहाँ वैठ रही हो, यहाँ आओ हमारे साथ,तुम तो हमारी बराबरी से बैठने के काबिल हो ।" "जो कामयाबी हमारे खानदान के किसी लड़के को भी ना मिली,वो तुमने पायी है । तुमने तो माँ-बाप के साथ हमारा भी नाम रोशन कर दिया बेटी !,,,,,,आदि, ,,,,आदि, ,,,आदि ।
श्रेया यह सब सुनकर स्तब्ध थी -जो मामा कभी प्रणाम के प्रत्युत्तर के अतिरिक्त कुछ ना कहते थे, आज पहली बार वो मुझसे इतना कूछ कह रहे हैं !!! श्रेया ने मुस्कुराते हुए, धीमे स्वर से मामाजी के 'ऊपर बैठने के प्रस्ताव' के लिए उन्हें धन्यवाद कहा, और माँ, माँसी, मामी, भाभी आदि महिलाओं के साथ नीचे ही बैठ गयी ,और अतीत में खो गयी ।
बचपन की बात है, एक बार जब श्रेया अपने ममेरे भाई भूपेन्द्र के साथ, एक खाट पर बैठी बतिया रही थी, तब उसे उसकी नानी ने, जोरदार, कड़कती हुई आवाज में डाँट लगायी थी -"तरे बैठ तरे, भैया की बिरोबरी से बैठ है का ।" तब ये बात आदरणीय तथाकथित, स्वघोषित, आधुनिक मामाजी ने भी सुनी थी, पर उस समय प्रत्युत्तर में कुछ न बोले थे।और आज,,,,,,,!!!आज, ,,,,,तुम तो हमारे साथ बैठने के काबिल हो, ,,,,,,आदि !,,,,,,,,,आदि !,,,,,,,
अपने विचारों में डूबती-उतराती श्रेया अपनी ममेरी भाभी के साथ रसोई के कामों मे जुट गयी । शाम को जब भोजन लगाया गया, तो मामाजी ने फिर वही बात दोहराई, -"बेटा श्रेया, हमारे पास बैठो,आओ! साथ ही खाना खाते हैं ।" श्रेया सब समझ रही थी, पर माँ का मन रखने के लिए मामाजी के पास बैठ गयी ।आज मामाजी ने अपने हाथों से श्रेया की थाली मे भोजन परोसा था ।
आज उसे बार बार किसी मशहूर शायर का एक शेर याद आ रहा था --
💦हर कोई अब जोड़ता है, हम से एक रिश्ता नया।
कामयाबी क्या मिली, रिश्तों का मौसम आ गया ।
-अंजुमन 'आरज़ू '
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