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सर्दी-वर्दी

लघु कथा

         स्वाति एक शिक्षक पिता की बेटी थी अतः आर्थिक स्थिति बहुत खराब ना थी । जाड़ों के दिन थे, बाजारों में रंग बिरंगी स्वेटर और ऊन का आना शुरु हो गया था । स्वाति उन रंगों से आकर्षित हुई, और ललचा कर मां से फरमाइश करके बोली- "मां मुझे समुद्री हरा और चुकंदरी गुलाबी रंग की एक स्वेटर बना दो ना...."
        मां ने उसे समझाते हुए कहा- "बेटा अभी तुम्हारे पास दो स्वेटर हैं, बदल-बदल कर पहनने के लिए, और फिर तुम अभी बड़ी हो रही हो, तो ये स्वैटर, छोटे भी तो हो जाएंगे न, अगले साल बना दूंगी हां ।"
      पर स्वाति जिद करने लगी, कि मां कम से कम ऊन ही लेकर रख लो, इतने सुंदर-सुंदर रंग के हैं ये, फिर मिले ना मिले ।
          बेटी को मितव्ययिता का पाठ पढ़ाने की उद्देश्य से अब मां ने थोड़ी गंभीरता से कहा- "बेटा! तुम्हारे पास ठंड से बचने के लिए पर्याप्त साधन हैं । कई लोग ऐसे भी होते हैं, जिनके पास इस कड़कड़ाती सर्दी मे तन धडकने के लिए कपड़े भी नहीं होते ।
         अपनी फरमाइश पूरी न होते देखकर स्वाति गुस्से से तमतमाती हुई, तुनक कर बोली- "मैं सर्दी वर्दी नहीं जानती.......मु......झे......तो.........
मां ने उसे बीच में ही दृढ़ता से रोक कर कहा- बेटा *"वर्दी सर्दी नहीं जानती"*
स्वाति आश्चर्य से बोली  मतलब ! ! ! शब्दों को उल्टा करने से क्या मतलब ! ! !
       मां ने कृतज्ञता पूर्वक, सम्मान भाव से कहना शुरु किया- "बेटा हमारे देश की सीमा पर जो प्रहरी है न, वे वीर जवान, जो सैनिक की वर्दी धारण करते हैं न, वे सर्दी की परवाह किए बिना, हमारी रक्षा करते हैं । सीमा पर कुछ जगहों पर तापमान शूंय अंश सेल्सियस से भी काफी नीचे होता है, जहां हाड़ कँपा देने वाली ठंड से बचाव के लिए, ऊनी कपड़े भी अपने हाथ खड़े कर देते हैं, पर वहीं ऐसी भीषण ठंड में भी हमारे वीर सैनिक गर्म जोशी के साथ, हमारी रक्षा करते हैं ।
         मां की गंभीर बातें सुनकर स्वाति का गुस्सा कब का सर्द हो चुका था ।वह बड़े भोले पन और आश्चर्य से बोली- "मां फिर ये सैनिक ठंड कैसे भगाते हैं !?!?!? मां ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा- "बेटा ये जो देश भक्ति का जज्बा है न..... इसमे ही कुछ ऐसी शक्ति होती है, कुछ ऐसा ओज होता है, कि ये सब खुशी खुशी सह लेते हैं । सीमा के इन प्रहरियों की वर्दी में देश सम्मान की गर्मी होती है बेटा। इसीलिए तो मैंने कहा
कि *वर्दी सर्दी नहीं जानती* ।"

रचना तिथि-19/12/2018
स्वरचित एवं मौलिक रचना
©®🙏
-सुश्री अंजुमन 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र•

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