हम शिक्षक
हर दिन मनाते हैं
एक अक्षय तृतीया
हर दिन भरते हैं
देश की
नवनिहाल-गागरों में
संस्कार-नीर
इस कामना से
कि इनका कभी
क्षय न हो
किंतु जाने किस ने?
शायद सत्ता ने ...
बेतुके नियमों के
गैर शैक्षणिक कार्यों के
हमें मारे हैं ऐसे पत्थर
जिसकी चोट से
नवनिहाल-गागर में
अदृश्य छिद्र हो गए हैं
और ये गागर रीते हो रहे हैं
संस्कार-नीर से
फिर इन रीते गागरों में
भरा जा रहा है
जाने किसके द्वारा ??
शायद सत्ता द्वारा ???
शायद समाज द्वारा
????
नैतिक पतन का
खारा पानी.....
आज फिर हम
मना रहे हैं
एक और अक्षय तृतीया
इस उम्मीद के साथ
कि एक दिन
सत्ता न सही
पर समाज तो
समझ जाएगा कि
पावन पूजन के लिए
या
प्यास बुझाने के लिए
स्वेराचार-सागर का
खारा पानी नहीं
संस्कारों का
गंगाजल ही चाहिए...।
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
07/05/2019
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