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श्रृंगार के रंग

उषा ने श्रृंगार किया है, मांग में अपनी लाली भर के ।
दिवस नायिका आती है फिर, भाल पे बिंदी-सूरज धर  के ॥1॥

तितली का श्रृंगार है उड़ना, फूलों का खुशबू देना ।
धरती का श्रृंगार कांतर, धानी चुनर सरके ॥2॥

झीलों का श्रृंगार है थमना, झरनों का झर जाना ।
कितने सुहाने लगते हैं रंग, नदी-लहर-चुनर के ॥3॥

मोगरे के गजरे से सजती,जूही चंपा चमेली ।
आमंत्रित करते गुलाब को,खुले केस केसर के॥4॥

हे उदास कि इसने हर श्रृंगार को बंधन माना ।
कितना सुख है बंधन में ये, समझ ना आए दोपहर के ॥5॥

प्रार्थना करती संध्या बोली, बहनें करें खूब श्रंगार ।
सभी नायिका रहें सुहागन, पांव पडू ईश्वर के ॥6॥

रात गले में पहन के आई, सुंदर तारक-माला ।
क्या कहने इसके बालों में, सजे चांद झूमर के ॥7॥

कविता का श्रृंगार है लय से, शब्दों का भावों से ।
मेरी कलम तो राह देखती, वीणापाणि वर के ॥8॥

      -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

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