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पतझड़-बहार


पतझड़ को भी बहारों सा सजाते हैं ।
चलो आज मुश्किलों को हराते हैं ।।

भागिरथी प्रयास कर गंगा धरा पल लाएँ ।
सूखाग्रस्त वंजर धरती को फिर हरियाएँ ।।
चलो हौसलों का पर्याय बन जाते हैं ।।
पतझड़ को भी बहारों सा सजाते है ।।

सूखी सरि में कैसे चले जर्जर कश्ती ।
मरु गुलशन में कैसे छाए फिर मस्ती ।।
चलो कुछ ऐसे उपाय अपनाते हैं ।।
पतझड़ को भी बहारों सा सजाते हैं ।

औचित्य वसुंधरा दिवस का क्या होगा ।
जब तक न हर एक मनुज सजग होगा ।।
चलो स्यम् जागृत हो सबको जगाते हैं ।
पतझड़ को भी बहारों सा सजाते हैं ।।

तप्त धरा पर जब छाए घटा मनहार ।
मन गाए खुश होकर तब राग मलहार ।।
चलो मौसम भर मुस्कुराते हैं ।
पतझड़ को भी बहारों सा सजाते हैं ।

पतझड़ को भी बहारों सा सजाते हैं ।
चलो आज मुश्किलों को हराते हैं ।।

    -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

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