Skip to main content

सफर

लघु कथा

   देर रात दरवाजे पर दस्तक हुई, सुमन ने दरवाजा खोला, तो देखा, सामने हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए सुनीता खड़ी थी।सुमन ने हर्ष और आश्चर्य से पूछा, इतनी रात गए... सुनीता बिना कुछ बोले सुमन से लिपट गई, और उसकी आंखों से अश्रु धारा बह चली । फिर थोड़ा संभल कर वह बोली-"दीदी अपना देबू लोकोपायलट हो गया है ।"अब सुमन की आंखें भी सुनीता की खुशी में नम हो गई थी, और उसे पुराने दिन स्मरण हो आए ।
       सुमन और सुनीता एक निजी विद्यालय में साथ मैं शिक्षिका थीं।दोनों में सामान्य सी पहचान थी । एक दिन विद्यालय की संचालिका ने बिना किसी पूर्व सूचना दिए दोनों को निष्कासित कर दिया । कारण-! प्रशासन का एक आदेश जारी हुआ था, कि अब निजी विद्यालयों में भी प्रशिक्षित शिक्षक रखे जाएं,और उनका न्यूनतम वेतन भी निर्धारित कर दिया गया था। और ये दोनों प्रशिक्षित थीं । विद्यालय संचालिका ने सोचा, इन्हें ज्यादा वेतन देना पड़ेगा, अतः क्यों न इन्हें निष्काषित ही कर दूँ ।
      चूंकि दोनों के साथ एक ही घटना घटी थी, अतः उनका सामान्य परिचय प्रगाढ़ मित्रता में बदल गया।तब एक दिन सुनीता ने बताया था, कि मेरे पति कुछ नहीं करते दीदी, अब घर चलाना बहुत मुश्किल है, कभी-कभी ऐसा लगता है कि किसी के भी घर में बर्तन मांजने लगूं, कम से कम इन बच्चों का पेट तो भर सकेगा।एक शिक्षित बेरोजगार की ऐसी देवसी देख, सुमन का गला भर आया था ।
          नम आंखों से उसने पूछा-इनसे तुम्हारी शादी कैसे हो गई दीदी, तब सुनीता ने बताया था- *साइकिल स्टोर* देखकर, शादी से पहले इन्होंने मेरे माता पिता को बताया था कि यह दुकान इनकी है, पर बाद में पता चला कि वह किसी और की थी, सब धोखा है दीदी ।
        उसके बाद सुनीता के हर सुख-दुख की साक्षी थी सुमन, कि किस तरह गरीबी में दिन काटते हुए उसने 250 से 2500 और फिर, ₹25000 प्रति माह तक का सफर किया। बच्चों को अच्छी शिक्षा दी और बेटी का विवाह किया।और आज, बेटा लोकोपायलट हो गया..... ।
        वर्षों का सफर पल दो पल में करके, सुमन ने सुनीता के आंसू पोंछे, और मिठाई का एक टुकड़ा उसे खिलाते हुए बोली,-"लो दीदी, बधाई हो! आज तुम्हारा झूठे साइकिल स्टोर से शुरू हुआ सफर, लोकोपायलट बेटे तक आ गया । दोनों सहेलियां एक बार फिर, लिपट गयीं ।

रचना तिथि 09/01/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू' ✍
छिंदवाड़ा मप्र

Comments

Popular posts from this blog

सरस्वती वंदना

हों गीत मेरे, संगीत भरे । लय ना लय हो, सरगम मुखरे । माँ शारदा विनती करूँ तुझ से । हों ये गीत अनूप, अटल-ध्रुव से । मेरे गीतों को आशीष दे माँ । ये मोहन हों, मुरली को धरे ॥1॥ लय ना लय हो स...

'इंद्रधनुष' (दोहा गीत)

इंद्रधनुष छाये गगन,खिले धरा का रूप । कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारुप ॥ इंद्रधनुष सा नेह तो, सतरंगी संसार । रंग मिलें मिलकर सजें, पायें रूप अनूप ॥ कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्र...

हम्द-02 रब के बंदों से की महब्बत है

रब    के   बंदों  से   की  महब्बत  है अपनी  तो    बस   यही   इबादत  है सारी   तारीफ़   है   ख़ुदा   के   लिए जिसकी  दोनों  जहाँ  में  अज़मत है फूल     पत्तों    में    बेल    बूटों   में देखिए   रब   की   ही    इबारत   है शुक्र है  रब का  जो दिया  सो दिया अपनी क़िस्मत से कब शिकायत है ये   नमाज़ें    ज़कात    हज    रोज़े रब  को   पाने  की  ही   रवायत  है ग़म  में  भी   ढूंढ  ली   ख़ुशी   मैंने ये   हुनर   उसकी  ही   इनायत  है लाख    बेचैनियाँ    सही    लेकिन उसके   एहसास  से  ही   राहत है जिसके...