मेरी कलम क्या गा पाएगी, व्यथा-कथा किसान की ।
आज भी सच्ची लगे कहानी, मुंशी के गोदान की ॥
एक किसान ने जैसे-तैसे, इन बच्चों को पाला है ।
खुद भूखा सोता है तब, इनके मुंह में निवाला है।
जाने कब तू सुनेगा ईश्वर, धरती के भगवान की ॥1॥
मेरी कलम क्या गा पाएगी व्यथा-कथा किसान की ।
अन्नदाता कहलाता पर, घर में एक न दाना आज ।
फाँके करने को विवश है, क्या खाएंगे खाना आज ।
रोजे रखने को कब इनको, आवश्यकता रमजान की ॥2॥
मेरी कलम क्या गा पाएगी, व्यथा-कथा किसान की ।
धरती के बेटे का बेटा, दर दर ठोकर खाता है ।
और धरा की बेटी को भी, कोई नहीं बिहाता है ।
कैसे अपनी पगड़ी बचाए, क्या सोचे कन्यादान की ॥3॥
मेरी कलम क्या गा पाएगी, व्यथा-कथा किसान की ।
अपना पेट काटकर भी ये, इक-इक दाना बोता है ।
अल्पवृष्टि अतिवृष्टि में फिर, सिर पर करजा ढोता है ।
सूदखोर ने आन बटोरी, पकी फसल खलियान की ॥4॥
मेरी कलम क्या गा पाएगी, व्यथा-कथा किसान की ।
उसको फुर्सत कहां जो बैठे, आम की ठंडी छांव में ।
धूप में रहकर हरियाली, फैलाता सारे गांव में ।
औरों की खुशियों की खातिर, लगा दी बाजी जान की ॥5॥
मेरी कलम क्या गा पाएगी, व्यथा-कथा किसान की ।
दर्द जुबां से कह ना पाए, मन ही मन ये घुटता है ।
बीज खाद बिजली और पानी, तरह तरह से लुटता है ।
इन सब से छुटकारा पाने, गहे राह शमशान की ॥6॥
मेरी कलम क्या गा पाएगी, व्यथा-कथा किसान की।
मेरी कलम क्या गा पाएगी, व्यथा-कथा किसान की ।
आज भी सच्ची लगे कहानी, मुंशी के गोदान की ॥
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
30/05/2018
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