यूं ही गुमसुम सी बैठी थी ।
सोच रही थी क्या जीना है ।
बिटिया आंचल धाम के बोली ।
मम्मी मुझको मम पीना है ॥1॥
खुद को छोड़ कहीं खो जाऊं ।
चिर निद्रा में मैं सो जाऊं ।
पर क्या होगा फिर इसके बाद ।
सोच ज़ोर धड़का सीना है ॥2॥
अभी तो बस दो साल हुई है ।
सधी हुई नहीं चाल हुई है ।
सीख रही है अभी बोलना ।
नानी को कहती नीना है ॥3॥
देखी जो मुझको यूं गुमसुम ।
पास में आ के रोली कुमकुम ।
भोलेपन से मुझसे बोली ।
किझने तेला क्या छीना है ॥4॥
माँ मैं हूं न तिला खिलौना
देख तु मेला लूप छलोना
फिल तू यूँ क्यों कल लोती है ।
क्या तेला आंचल झीना है ॥5॥
उसे देख मैं जब मुस्काई ।
वो भी खुश होकर यूँ गाई ।
नाच उठी फिर थिरक थिरक कर ।
तक तक तक तक धिन धीना है ॥6॥
जब उसको यूँ गाते देखा ।
नाच उठी किस्मत की रेखा ।
जीना* सीख लिया फिर मैंने ।
हिम्मत ही जीवन-जीना* है ॥7॥
नवजीवन का स्वाद चखा है ।
रंजो गम को दूर रखा है ।
उसके भोले बचपन से ही,
जीवन अमृत रस पीना है॥8॥
स्वरचित एवं मौलिक रचना
©🙏
अंजुमन *आरज़ू*✍©🙏
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(7)
1*जीना = जीवित रहना
2* जीना = सीढ़ी
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