✍रेखाचित्र✍
उन दिनों के स्मृतियों में एक विचित्र सा आकर्षण है, अजीब खट्टे-मीठे से अनुभव हैं, कभी-कभी लगता है, जैसे सपने में सब देखा होगा।
बात उन दिनों की है जब मैं बी•एड• करने के लिए जबलपुर गयी थी, यह शहर मेरे लिए बिल्कुल अनजान था। हां हमारे कस्बे के परिचित परिवार का एक मुझसे काफी छोटा लड़का प्रवीण वहां बीई• कर रहा था। बस वही परिचित था हमारा। मेरे पिता ने सोचा इस अनजान शहर में अपनी बेटी को किसके सहारे छोड़ेंगे, सो वे एक किराए के मकान की तलाश में लग गए कि अपनी दृष्टि विक्लांग बेटी के साथ हम माता-पिता भी यहीं रहेंगे। अब मेरे लिए यह B.Ed बहुत ही कष्टप्रद बनता जा रहा था। पिता स्कूल शिक्षा विभाग में प्राचार्य थे, पूरे एक वर्ष का अवकाश लेकर यहां, मेरे साथ रहने को तैयार.....मैंने उनसे कहा भी कि मैं हॉस्टल में रह लूंगी, पर भावुक पिता कहां मानते, अपनी उस बेटी को अनजान शहर में कैसे छोड़ सकते थे भला, जो अपने ही कस्बे में भी कभी अकेली ना निकली हो।
बहरहाल पिताजी ने प्रवीण से कहा कि बेटा तुम्हारे कमरे के बाजू वाला कमरा खाली है तो क्यों ना हम यहीं रह लें, तुम अपने मकान मालिक से बात करवाना। मकान मालिक से बात की तो उन्होंने कहा- "हमें अभी अपना कमरा किराए पर नहीं देना है......." और दो टूक जवाब देकर वे चले गये। हमारे द्वारा अधिक किराया देने की बात भी नजरअंदाज कर दी गई। पिताजी ने प्रवीण से पूछा, क्या बात है ? इनका व्यवहार कुछ उखड़ा हुआ सा क्यों लगा!!! बाद में प्रवीण ने उनसे अलग से बात की तो उन्होंने जो कहा, प्रवीण से हम वह अपने लिए सुनकर अवाक रह गए-" हम मुसलमानों को अपना मकान किराए पर नहीं दे सकते, ये आतंकवादी होते हैं ।" हम पिता-पुत्री स्तब्ध थे। स्थिति विचार शून्य होने जैसी थी परंतु कुछ क्षणों बाद मैं अपने बचपन के गलियारों में विचारमग्न हो गई।
मुस्लिम होते हुए भी हमने अपनी दादी को दीपावली में दीए जलाते देखा, अपने आंगन में भाव विभोर हो, अहीरों को नृत्य करते देखा, अपने घर की दीवारों पर सतिये काढते देखा, रक्षाबंधन पर बुआओं को अपने घर आते देखा, मां से सुना कि जब नानाजी जीवित थे, तब रक्षाबंधन पर सभी मासियाँ भी इकट्ठी हो जाया करतीं थीं । फिर अपने पिता को ग्राम की सामूहिक गणेश उत्सव समिति की नींव रखते देखा, होली के अवसर पर पिता के मित्रों की टोली की महफिल, घर के आंगन में सजते देखा; विष्णु चाचा को ईदगाह की पुताई करते देखा, ईद के उत्सव में मालवीय चाचा से ईदी पायी, बबीता और हेमा जैसी कई सहेलियों की आत्मीयता देखी, दीपिका का यह कहना "अम्मीजी मैं दो कटोरी सेंवैया एक्स्ट्रा खाऊंगी"....आज मुझे बहुत याद आ रहा था।
जिस घर में रामचरितमानस, गीता, बाइबल और कुरआन एक सा सम्मान पाती है, जहाँ बच्चों को बचपन में सच्ची मानवता की घुट्टी, ये पढ़ाकर पिलाई गयी कि तुलसी जी के रामचरितमानस के प्रथम पाठक, प्रूफरीडर,समीक्षक रहीम जी थे। जिस घर में कभी यह महसूस ही नहीं हुआ कि हम मुस्लिम है उन्हें आज यह तमाचा पड़ा......ओहहहह!!!
आज तक तो हम खुद को, हिंदुस्तानी समझते थे, पर आज यह क्या हुआ.......
मैं विचारों का एक छोर पकड़ कर पिता के साथ कॉलेज की ओर बढ़ रही थी। फिर मैं अपने घर-ग्राम से आगे देश के वृहद पटल के बारे में सोचने लगी कि- आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता,!!!! यदि होता तो हम शहीद अब्दुल हमीद को इतनी श्रद्धा से नमन न कर रहे होते, यदि होता तो निवर्तमान राष्ट्रपति, मिसाइल मैन, डॉ श्री एपीजे अब्दुल कलाम भारत को सामरिक दृष्टि से इतना सशक्त ना कर गए होते कि भारत विश्व के सामने गर्व से सिर उठाकर चल सके, और भी ना जाने कितने उदाहरण थे सच्चे हिंदुस्तानियों के,सच्ची मानवता के।आज यह सब इसलिए याद आ रहा था क्योंकि आज इस अनजान शहर की एक कुत्सित मानसिकता ने हमें एक दंश दिया था।
आज की स्थिति देखकर लगता है जैसे वह सब सपना ही था।आज वह सपना कहीं खो गया है।काश मानव धर्म का सपना पूरा हो जाता तो आज भारत की दशा ही कुछ और होती।
बहरहाल विचारों की रुई को मस्तिष्क के पिंजन में धुनते हुए हम पी एस एम महाविद्यालय पहुंचे, वहां प्रवेश की औपचारिकताओं में लग गये।
-अंजुमन 'आरज़ू'
स्वारचित,
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