लघु कथा
आज सुबह गुनगुन बड़ी स्फूर्ति के साथ उठी, और घर में इधर-उधर दौड़ रही थी, शायद कुछ तलाश कर रही थी । रानू बोली- "क्या हुआ बेटे, किसे खोज रही हो", गुनगुन- "दादी को,,, आज उनकी शादी है ना, सबसे पहले मैं बधाई दूंगी उन्हें। रानू मुस्कुराते हुए- पर दादी अकेले की शादी थोड़े ही है, दादाजी की भी तो हैं, उन्हें भी तो बोल दो।गुनगुन- "नही, मैं पहले दादी को कहूंगी फिर दादा जी को। रानू- "अच्छा तो तुम दुल्हन की तरफ से हो,,,,,,,,,?गुनगुन- हाँ बुआ, और दादाजी बारात लेकर आएंगे, बड़ा मजा आएगा। दोनों बुआ भतीजी मनहार कर, खिलखिला रही थी, तभी दादी स्नान कर आयीं । चार वर्षीय गुनगुन ने उन्हें शादी की सालगिरह की बधाई दी, फिर वह फुदक-फुदक कर दादाजी के पास गई और उनके दिन की शुरुवात भी मीठी कर दी।
घर हास परिहास से गूंज रहा था, तभी रेखा सुभाष से बोली, "इसे नहला दो ना जी!!! मैंने नहा ली हूं, इसे नहलाऊंगी तो मैं फिर से भीग जाऊंगी।" सुभाष- "मुझे जरूरी काम से बाहर जाना है, गुनगुन! बेटा तुम बुआ से नहा लो।" कहकर गुनगुन के पापा, अपना जरुरी काम निपटाने बाहर चले गए। रानू- -"चलो गुनगुन नहा लो" गुनगुन- नहीं,,,,,, मम्मी से,,,,,,,,,,। रानू- क्यों बेटा, बुआ बॉडी पार्ट्स पढ़ाते हुए नहलाती है, इसलिए दुआ से नहीं नहाना हे लाड़ो बेटी को। गुनगुन -मुझे मम्मी पसंद है ,,,,,,,,,बुआ पसंद नहीं,,,,,,,,,,,। गुनगुन की दादी, यानी रानू की मम्मी कुछ कहने ही वाली थी, कि रानू ने उन्हें इशारे से चुप करा दिया। उसे भाभी के संबाद की प्रतीक्षा थी यहाँ, पर रेखा चुप थी।
अबोध गुनगुन ने कुछ गलत नहीं कहा था। संसार में मां से प्यारा कोई नहीं होता। रानू को भी अपनी मां ही सर्वोपरि है। किंतु इन नन्ही कोपलों को सु संस्कृत करने के लिए गुनगुन की मां का एक वाक्य वहां अपेक्षित था- अरे बेटा ऐसा नहीं कहते, बुआ भी प्यारी है, चलो सॉरी बोलो,,,,,,,। पर वे चुप्पी साधे हुए थीं ।
रानू को अभी कुछ दिन पहले की बात स्मरण हो आई,, जब गुनगुन ने अपने मामा के लिए बड़ी मासूमियत से कहा था "मामा जी खाली हाथ चले आते हैं, मेरे लिए कभी कुछ नहीं लाते ।मेरे चाचा तो हमेशा मेरे लिए कुछ न कुछ,,,,,," तब भाभी ने उसे जोरदार डांट लगाई थी। 'अरे बेटा! मामा जी जल्दी में आए हैं, और फिर कुछ ना भी लाएँ तो क्या, उनका आशीर्वाद तो है ना हमारे लिए । ऐसा नहीं बोलते, गलत बात होती है ऐसा बोलना।"..... और आज......... चुप्पी........?????
बहरहाल नन्ही गुनगुन, बुआ की लाडो, थोड़ी देर बाद फिर बुआ की गोद में थी उतने ही स्नेह से कह रही थी- "बुआ ये मोबाइल टूट गया इसे जुड़ा दो ना ...."। रानू ने भी अपनी लाडो पर पहले सा ही वात्सल्य लुटाया। पर उसे आज भाभी की चुप्पी खल गई। लोग कहते हैं शब्द तीर का काम करते हैं। पर आज अनुभव हुआ कि कभी कभी *चुप्पी* भी तीर से कम नहीं चुभती
✍अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू' ©🙏
24/05/2019
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