विधा संस्मरण
दृष्टि बाधित होने के कारण मेरी शिक्षा की शुरुवात मां ने स्पर्श के माध्यम से की, और मेरे हाथों पर अपनी अंगुलीयों से अ से ज्ञ तक लिखकर मुझे भाषा ज्ञान कराया । जैसे जैसे कक्षाएं बड़ी होती गयीं चुनौतियां भी विशाल होती गयीं, पर माता-पिता ने हार मानना नहीं सिखाया । यही कारण था कि मैं गणित जैसे विषय भी सुनकर ही पड़ा करती थी ।
बात उन दिनों की है, जब मैं कक्षा आठ में पढ़ती थी । परीक्षाओं का दौर था, पर मेरे लिए कुछ अधिक कठिन परीक्षाएं लिखी थी विधाता ने । गणित के प्रश्न पत्र के समय मुझे तेज माइग्रेन हुआ, फलतः मैं टेबल पर सिर रखकर पीड़ा सहती रही, इस प्रतीक्षा में कि शायद सिर दर्द कम हो और मैं पास होने लायक अंक जुटा पाऊं, पर यह नहीं हुआ । जब परिणाम आया तो जैसी आशंका थी वैसा ही हुआ, मुझे गणित में पूरक आई ।
मेरे शिक्षक पिता, पूरक की औपचारिकता पूर्ण करने मुझे लेकर विकासखंड के विद्यालय पहुंचे, जहां उन्हें अपने साथी शिक्षकों के प्रश्नों के क्रूर उत्तर का सामना करना पड़ा ।
"और भाई मंसूरी, यहां कैसे ? पिताजी का फीका सा जबाब, "कुछ नहीं यार बेटी का पूरक परीक्षा का फॉर्म भरने आया हूं ।"
ना जाने कितनों ने यही प्रश्न उछाला और पिताजी ने जवाब दुहराया, फिर वहां एक और महाशय आए, जो मां के मायके से होने के कारण पिताजी से जीजा का रिश्ता निभाते थे, हम भी उन्हें मामा जी कहते थे । दोनों के बीच काफी मजाक भी होता था । उन्होंने भी यही सवाल उछाला, चूँकि उनसे घनिष्ठ संबंध थे अतः पिताजी ने मेरी समस्या बतानी चाही, कि बेटी की नजर थोड़ी कमजोर है, पर मामा जी कुछ सुनना ही नहीं चाहते थे, उन्होंने कहा "हाँ मंसूरी, दूसरों को तो बहुत ज्ञान देता है, अब खुद की बेटी को देख, इसी को कहते हैं दिया तरे अंधेरा ।" पिता जी ने काफी समझाने का प्रयास किया, पर वेउन की बात हवा में उड़ा कर चले गए ।
मुझे महसूस हुआ कि मेरे कारण मेरे पिता का सिर झुक गया। पहले भी मैं अपनी क्षमता से अधिक मेहनत करती थी, पर अब मेरी क्षमता में चुभते शब्दों का गुणा हो चुका था। मेरे कानों में बार-बार यही वाक्य गूंजता "देख मंसूरी, इसी को कहते हैं दिया तरे अंधेरा।"
बहरहाल मैंने आठवी की पूरक परीक्षा उत्तीर्ण की, और फिर मेरे पिता का सिर मेरी वजह से न झुके, इसलिए दसवीं में गणित में अधिभार प्राप्त किया । उनके शब्द मुझे चुभते रहे, और मैं मेहनत करती रही ।
आज मैं उसी विद्यालय में शिक्षिका हूं, जहां कभी यह तीखे तीर चुभे थे ।
रचना तिथि 1 अप्रैल 2019 रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
©®🙏
अंजुमन मंसूरी आरज़ू✍
छिंदवाड़ा मप्र
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