किचकिच किचकिच लगी हुई है जीवन में ।
सुबह सवेरे घर में होती, दोपहरी ऑफिस में रोती ।
शाम ढले से रातों में भी, किच किच किच किच किच ॥
जब नन्हे ने आंखें खोली, दादी-नानी लड़ती थी ।
बुआ-मासी बोल पडी तो, बातें और भी बढ़ती थी ।
दूध शहद की बातों में भी, किच किच किच किच किच ॥1॥
भैया को जो दिया खिलौना, मुझको भी वो ही दे दो ।
टॉफी उसको एक ही देना, मुझको तुम दो-दो दे दो ।
बस्ता बॉटल छातों में भी,किच किच किच किच किच ॥2॥
हम बैठेंगे आगे हमको, आगे बढ़ते जाना है ।
लड़ते-लड़ते ही गाते सब, एका का तराना है ।
बचपन के जज्बातों में भी किच किच किच किच किच ॥3॥
जब हम घर से बाहर निकले, दुनिया में ये देखा है ।
मिटा-मिटा के घटा रहे हैं, बढ़ी हुई जो रेखा है ।
सहकर्मी के खातों में भी, किच किच किच किच किच ॥4॥
टी•वी• चैनल में देखो या, सुर्ख़ी हो अखबारों की ।
शब्दों से ही युद्ध छिड़ा है, क्या जुर्रत तलवारों की ।
पढ़े लिखे हजरातों में भी, किच किच किच किच किच ॥5॥
धर्म धीरु जनता से वसूलें, मोटा मोटा चंदा है ।
सेवक-खादिम पंडित-मुल्ला, सबका ये ही धंधा है ।
माता के जगरातों में भी किच किच किच किच किच ॥6॥
ससुर जमाई बोल रहे ना, सास बहू में बनती है ।
जीजा साले तने तने हैं, नंद भावज में ठनती है ।
मातम में, बारातों में भी, किच किच किच किच किच ॥7॥
भाई लड़े मेढ़ो की खातिर, परिवारों में द्वंद हुआ ।
बहनें पहुंची अदालतों में, आना जाना बंद हुआ ।
रिश्तो की सौगातों में भी, किच किच किच किच किच ॥8॥
सुबह से लेकर शाम तलक बस आशा और निराशा है ।
आंख खुले से बंद होने तक जीवन एक तमाशा है ।
मृत्यु के आघातों में भी, किच किच किच किच किच ॥9॥
किचकिच किचकिच लगी हुई है जीवन में ।
सुबह सवेरे घर में होती, दोपहरी ऑफिस में रोती ।
शाम ढले से रातों में भी, किच किच किच किच किच ॥
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
24/07/2018
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