हैं हम उस पूर्ण की रचना, ये दर्शन भूल जाएँ क्यों ।
अभावों को भी भावों से, भला ना हम सजाएँ क्यों ।
विधाता ने रचा जिसको, अधूरी हो नहीं सकती ।
अधूरी जिंदगी के नाम पे आँसू बहाएँ क्यों ॥
कि टूटा दांत बचपन में, जो परशुराम से लड़ते ।
बनाई लेखनी अपनी, नित नूतन सृजन करते ।
कुशलता से हम अपनी खामियाँ खूबी बना लेंगे ।
उपासक हैं गजानन के, तो फिर हम हार जाएँ क्यों ॥
अधूरी जिंदगी के नाम पे आँसू बहाएँ क्यों ॥
ये माना मुश्किलें है राह में पर्वत है खाई है ।
मगर ये भी हकीकत है कि मेहनत रंग लाई है ।
अगर हो आरजू सच्ची तो मंजिल मिल ही जाती है ।
लगन पूरी हो मंजिल की तो मुश्किल से घबराएँ क्यों ॥
अधूरी जिंदगी के नाम पे आंसू बहाएँ क्यों ॥
रचना दिखी 16/09/2018
स्वरचित, मौलिक एवंचना ।
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
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