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वसंत की सुवास


    रश्मि चाय-नाश्ते के साथ, जब बैठक में आई, तो देखा पतिदेव गाजर कीस रहे हैं। उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान तैर गई। उसने उनकी और ट्रे बढ़ाया व स्वयं भी चाय की चुस्कियाँ लेते हुए अतीत के गलियारों में विचरने लगी ।
   केंद्रीय विद्यालय में उसका पहला दिन था।क्या छात्र,क्या शिक्षक,सभी की नजरें उसे ही निहार रहीं थीं। सलीके से पहनी गुलाबी साड़ी में वह किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी। छात्र-छात्राओं को,उसकी विषय पर पकड़,पढ़ाने का अंदाज़,तो सहकर्मियों को उसके बात करने की अदा, व्यवहारिकता,सादगी, भा रही थी। इस तरह वह धीरे धीरे,सब की प्रिय बनती जा रही थी। वहीं विवेक भी था,जो इन सबसे परे उसमे यौवन का वसंत निहार रहा था। रश्मि उसकी आंखों को पहचान कर बचने लगी थी।
    एक दिन जब वह पीली साड़ी में थी, विवेक ने आगे बढ़कर उससे कहा था-"क्या तुम अपने इस #वसंत_की_सुवास का अधिकार मुझे दोगी..?"उसके गालों में जो पीले रंग का प्रभाव था,वह गुलाबी रंगत लेने लगा। उसने सँकुचाते,लजाते,मुस्काते हुए कहा था-"यदि आप इस अधिकार में कर्तव्य की सुवास घोल दें तो...मेरे पिताजी से..।वाक्य पूरा किए बिना ही,वह आगे बढ़ गई थी।
   दोनों परिवारों की सहमति के बाद,विवेक रश्मि का बहुत खयाल रखने लगा। रश्मि भी भविष्य के सपने संजोने लगी,कि यदि ये इतना ही ध्यान रखेंगे,तो कामकाजी होने की थकान,कुछ कम ही होगी।
    विवाह के बाद विद्यालय का पहला दिन था। परीक्षाओं का दौर था,काम की अधिकता ने दोनों को ही मानसिक और शारीरिक रूप से थका दिया था। घर लौटकर रश्मि में चाय बनाई तो रसोई से ही आवाज़ लगाई-"सुनो! यहीं आ जाओ ना,मैं थक गई हूं बहुत"। विवेक में बैठक से ही कहा-"यहीं ले आओ,मैं लेट चुका हूं"। रश्मि के आने पर वह कड़क आवाज़ में बोला-"बाहर भी मैं तुमसे बड़े पद में हूं, और इस बात का हमेशा ध्यान रखना,कि मैं पति हूँ तुम्हारा, जाओ पानी भी लेकर आओ मेरे लिए।"रश्मि पहले आंखों में,और फिर ग्लास में पानी ले आई। वह सोच रही थी, जब दोनों का कार्य बराबर,थकान भी बराबर,तो फिर यै पुरुष का अभिमान...
   कुछ समय बाद प्राचार्य पद हेतु विभागीय परीक्षा हुई,  जिसमें दोनों ने कोशिश की। रश्मि का प्रयास सफलता में बदल गया।   उसने उसी विद्यालय में प्राचार्य का पदभार ग्रहण किया। परिणाम आने के बाद ही पतिदेव के व्यवहार में अंतर समझ में आने लगा था। आज प्राचार्य का पदभार ग्रहण करने के बाद,घर में उसकी पहली शाम थी ।
    उसने चाय खत्म करते हुए कहा-"गाजर कीस रहे हो...??क्यों आपके अभिमान का क्या हुआ..??? विवेक में पश्चाताप के भाव से कहा-"तुम्हारे स्वाभिमान के सामने ढह गया...बौना पड़ गया...रश्मि क्या तुम मुझे माफ नहीं कर सकतीं, क्या हमारे बीच की वो पुरानी दरार,..?"रश्मि ने बीच में ही उसे रोकते हुए कहा-"लाओ ये किसनी और गाजर मुझे दो, और हां, दांपत्य जीवन में कई मौसम आते हैं, पतझड़ भी,पर दांपत्य के #वसंत_की_सुवास हमेशा रहती है। इस तरह वह विवेक की रश्मियाँ बिखेती हुई, गाजर कीसने में लग गई ।

रचना तिथि 13/02/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र

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