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मुसाफ़िर

मुसाफिर हूँ मैं जीवन की, कि मेरा काम है चलना ।
मेरा आग़ाज़ है चलना, मेरा अंजाम है चलना ॥

कि मेरी राह पथरीली, नज़र के सामने कोहरे ।
मेरी हिम्मत के आगे पर, न मेरे पांव है ठहरे ।
विजय हो या पराजय हो, मुझे अविराम है चलना ॥1॥
मुसाफिर हूँ मैं जीवन की, कि मेरा काम है चलना ।

कभी छैंया लुभाती है, कभी मन धूप भाती है ।
कि दूरी हर दुख-पत्थर को, सुखद-चंदा बनाती है ।
कि मंजिल मन कहाँ मोहे, मेरा अभिराम है चलना ॥2॥
मुसाफिर हूँ मैं जीवन की, कि मेरा काम है चलना ।

न कोई साथ में मेरे,  अकेले ही भटकती हूँ ।
विधाता जिस तरह चाहे, उसी तरह मटकती हूँ ।
वो जब चाहे कि थम जाओ, तो फिर नाकाम है चलना ॥3॥
मुसाफिर हूँ मैं जीवन की, कि मेरा काम है चलना ।

नदी हों या के बादल हो, सभी चल कर निखरते हैं ।
कि जीवन सार है इसमें, ये बन बन कर बिखरते हैं ।
जनम चलना, मरण चलना, सुबह से शाम है चलना ॥4॥
मुसाफिर हूँ मैं जीवन की, कि मेरा काम है चलना ।

      -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
29/07/2018

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