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अग्नि

लघु कथा

         अमर दरवाजे पर खड़ा था, उसने बहुत धीमे स्वर में आवाज़ लगाई, दीदी......
ज़ोया सोच रही थी आज अमर चहक क्यों नहीं रहा है?? उसने आगे बढ़ कर देखा, अमर कांप रहा था । ज़ोया घबराई, अमर के सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, क्या हुआ भैया तू......? वह बड़ी मुश्किल से बोल पाया, दीदी, वो बड़ी दीदी है ना, रजनी, अब ज़ोया का दिल बैठा जा रहा था ....वह बोली, क्या हुआ रजनी को, जीजा जी तो ठीक है ना.....
       दीदी रजनी दी का बेटा फांसी लगाकर......
और उसके शब्द अनकहे ही रह गए, वह फूट-फूट कर रोने लगा  । थोड़ा संभलकर वह बोला, उसकी जिद की ज्वाला सबको ले डूबी दीदी....
कैसी जिद भैया, ज़ोया आंसू पोंछते हुए बोली ।
विकास ने एक महंगी गाड़ी की जिद की, जब वह बहुत समझाने पर भी नहीं माना, तो रजनी दी ने कुछ गहने बेचकर किश्तों में उसकी पसंद की गाड़ी उठा ली । फिर आपको तो पता ही है दीदी, जीजाजी के कैंसर का पता लगते ही रजनी दी कितनी टूट गयीं..... पैसे पानी की तरह बहाना पड़ रहा है, कुछ मदद हम ने भी की पर.....
उन्होंने गाड़ी की बाकी किश्तें जमा नहीं कीं, और उसे लौटा दिया, बस इसी बात को लेकर विकास इतना नाराज हुआ कि........ उसने यह कदम उठा लिया।
         ज़ोया सजल आंखों से अपने राखी भाई की दयनीय दशा देख रही थी, और अपनी बचपन की सखी रजनी के बारे में सोच रही थी, कि वह, बेटे की झूठी प्रतिष्ठा और पति के लगभग असाध्य रोग की दोहरी अग्नि की विडंबना किस तरह सह सकेगी ।

रचना तिथि 13/01/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
  -सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र

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