Skip to main content

जीवन-नौका

ताटंक छंद

विधान:- सम मात्रिक छंद, 16-14 की यति से 30 मात्राएं, पदांत में यगण अनिवार्य, कुल 4 चरण, क्रमागत युगल चरण सम तुकांत ।

_______________________________

                    जीवन-नौका

प्रकृति चैत्र मास में जैसे, सकल नवल हो जाती है ।
जीवन को जीवन देकर माँ, नवजीवन खुद पाती है ।
तेज भले वैशाख धूप हो, पथ संघर्ष चलाती माँ ।
अमलतास पलाश शिरीष सा, खिलना हमें सिखाती माँ ।

जीवन जेठ दुपहरी सा तो, माँ है पीपल छाया सी ।
जल सी पावन शीतल निर्मल, मूल्यवान सरमाया सी ।
आषाढ़ मास बरखा से जब, मन-माटी गीली हो ली ।
संस्कार-बीज बो देती माँ, बोल बोल मीठी बोली ।

माँ सावन सा नेह सींचती, सजा अधर पर मुस्कानें ।
खुश होकर कजरी गाती वह, हरियाती जब संतानें ।
कभी निराशा में जब छाते, भय के बादल भादो में ।
संबल भरती सूर्य किरण सी, माँ आशा संवादों में ।

माँ कहती दुख-घन जब छटते, शरद चंद्रमा है आता ।
हों ज़रूरत ओस सी छोटी, अश्विन संदेशा लाता ।
मन कार्तिक की रातों को माँ, दीवाली कर देती है ।
घोर तमस्वी भरी अमा को, जगमग जग कर लेती है ।

अवसादों की सर्दी में माँ,  धूप बने हल्की मीठी ।
अगहन सूरज बन हर लेती, सारी पीड़ाएँ सीठी ।
पौष दिवस सा सुख जब आकर, झट से वापस हो जाए ।
धीरज धरना सिखला कर माँ, अनुभव ऊष्मा फैलाए ।

माघ कुहासा सी अड़चन गर, इस जीवन में छा जाती ।
डगमग मत हो भर डग मग मे, माँ हिम्मत से समझाती ।
माँ कोयल सी बोल रही है, मौसम हुआ सजीला है ।
इतनी सीखें पा जीवन ये, फाल्गुन सा रंगीला है ।

रोज़ सुबह से सांझ ढले तक, आगे हमें बढ़ाती माँ ।
उदय अस्त सा सुख-दुख आता, जीवन पाठ पढ़ाती माँ ।
ये सुबह सांझ ये मास बरस, आस-हवा का है झोंका ।
बस माँ की आशीष-पाल से, चलती है जीवन नौका ।

      -अंजुमन 'आरज़ू'©✍
10/05/2019

Comments

Popular posts from this blog

'इंद्रधनुष' (दोहा गीत)

इंद्रधनुष छाये गगन,खिले धरा का रूप । कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्रारुप ॥ इंद्रधनुष सा नेह तो, सतरंगी संसार । रंग मिलें मिलकर सजें, पायें रूप अनूप ॥ कुछ ऐसा ही है सखी, जीवन का प्र...

हम्द-02 रब के बंदों से की महब्बत है

रब    के   बंदों  से   की  महब्बत  है अपनी  तो    बस   यही   इबादत  है सारी   तारीफ़   है   ख़ुदा   के   लिए जिसकी  दोनों  जहाँ  में  अज़मत है फूल     पत्तों    में    बेल    बूटों   में देखिए   रब   की   ही    इबारत   है शुक्र है  रब का  जो दिया  सो दिया अपनी क़िस्मत से कब शिकायत है ये   नमाज़ें    ज़कात    हज    रोज़े रब  को   पाने  की  ही   रवायत  है ग़म  में  भी   ढूंढ  ली   ख़ुशी   मैंने ये   हुनर   उसकी  ही   इनायत  है लाख    बेचैनियाँ    सही    लेकिन उसके   एहसास  से  ही   राहत है जिसके...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...