ताटंक छंद
विधान:- सम मात्रिक छंद, 16-14 की यति से 30 मात्राएं, पदांत में यगण अनिवार्य, कुल 4 चरण, क्रमागत युगल चरण सम तुकांत ।
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जीवन-नौका
प्रकृति चैत्र मास में जैसे, सकल नवल हो जाती है ।
जीवन को जीवन देकर माँ, नवजीवन खुद पाती है ।
तेज भले वैशाख धूप हो, पथ संघर्ष चलाती माँ ।
अमलतास पलाश शिरीष सा, खिलना हमें सिखाती माँ ।
जीवन जेठ दुपहरी सा तो, माँ है पीपल छाया सी ।
जल सी पावन शीतल निर्मल, मूल्यवान सरमाया सी ।
आषाढ़ मास बरखा से जब, मन-माटी गीली हो ली ।
संस्कार-बीज बो देती माँ, बोल बोल मीठी बोली ।
माँ सावन सा नेह सींचती, सजा अधर पर मुस्कानें ।
खुश होकर कजरी गाती वह, हरियाती जब संतानें ।
कभी निराशा में जब छाते, भय के बादल भादो में ।
संबल भरती सूर्य किरण सी, माँ आशा संवादों में ।
माँ कहती दुख-घन जब छटते, शरद चंद्रमा है आता ।
हों ज़रूरत ओस सी छोटी, अश्विन संदेशा लाता ।
मन कार्तिक की रातों को माँ, दीवाली कर देती है ।
घोर तमस्वी भरी अमा को, जगमग जग कर लेती है ।
अवसादों की सर्दी में माँ, धूप बने हल्की मीठी ।
अगहन सूरज बन हर लेती, सारी पीड़ाएँ सीठी ।
पौष दिवस सा सुख जब आकर, झट से वापस हो जाए ।
धीरज धरना सिखला कर माँ, अनुभव ऊष्मा फैलाए ।
माघ कुहासा सी अड़चन गर, इस जीवन में छा जाती ।
डगमग मत हो भर डग मग मे, माँ हिम्मत से समझाती ।
माँ कोयल सी बोल रही है, मौसम हुआ सजीला है ।
इतनी सीखें पा जीवन ये, फाल्गुन सा रंगीला है ।
रोज़ सुबह से सांझ ढले तक, आगे हमें बढ़ाती माँ ।
उदय अस्त सा सुख-दुख आता, जीवन पाठ पढ़ाती माँ ।
ये सुबह सांझ ये मास बरस, आस-हवा का है झोंका ।
बस माँ की आशीष-पाल से, चलती है जीवन नौका ।
-अंजुमन 'आरज़ू'©✍
10/05/2019
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