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लघु कथा

      एक दिन की बात है, प्रकाश जी का सारा परिवार अपनी कार से, जबलपुर की और चला जा रहा था। प्रकाश जी को उत्कृष्ट शिक्षक का कोई सम्मान मिलने वाला था। रास्ते में चौरई के पास 62 वर्षीय प्रकाश जी की आंखें भर आई।  बेटे बेटियां और पत्नी, उनके संघर्ष की कहानी जानते थे, इसलिए चुप थे, पर नन्ही पोती बोल पड़ी, क्या हुआ दादाजी, आपकी आंखों में आंसू, "कुछ नहीं बेटा" बोलकर  प्रकाश जी अपने अतीत में खो गए।
      4 वर्ष का था मैं, तब मेरे पिता नहीं रहे, मां ने मजदूरी कर पाला, मैं स्वयं भी तो मां के साथ मजदूरी पर जाया करता था। भुखमरी ऐसी कि उड़द मूंग की रोटी, जवार बाजरा मक्का,.......गेहूं चावल तो कई कई दिन नसीब नहीं होता था। जिस दिन गेहूं की रोटी सब्जी और चावल मिल जाता, उस दिन त्यौहार सा लगता था, हमें थेगड़े वाले कपड़े मिल जाएँ,  तो भी शुक्र मनाते थे।
      गांव में किसी पटेल  का मकान बन रहा था। हम वहां काम पर जाते थे। बड़े कबेलू वाला घर,..... उसे सर उठा कर निहार रहा था मैं, बस निहार ही रहा था, क्योंकि इतना बड़ा सपना देखना भी तो मेरे सामर्थ में नहीं था तब,۔۔۔۔۔۔۔۔ तभी मालिक की तीखी आवाज आई "काहे रे, तू भी बनाहे का एसो मकान" । उस पटेल के शब्द मेरे कानों में कई दिनों तक व्यंग की तरह  चुभते रहे।
     अच्छी बात यह थी, कि मैं काम के साथ लगन से पढ़ाई भी करता था।
पांचवी तक अध्ययन के लिए ग्राम में ही विद्यालय था, किंतु बोर्ड परीक्षा का केंद्र वहां नहीं हुआ करता था। 3 किलोमीटर दूर परीक्षा केंद्र बनाया गया ।मुझे भी परीक्षा देने जाना था। अप्रैल का महीना, तपती दोपहरी ,आने जाने का कोई साधन नहीं, साधन हों भी तो उसे पाने के लिए पैसे नहीं, मैं इसी सड़क से पैदल अपने परीक्षा केंद्र की ओर बढ़ चला,तेज धूप में जो पैर जलने लगे तो रास्ते के पेड़ों के पत्ते तोड़कर पैरों में बांध लिए, उस समय मैंने ये सपना देखा था, कि काश मेरे पैरों में भी जूते होते, नहीं तो कम से कम चप्पल ही होती.....
     खैर रुखी सूखी बासी रोटी खाकर पांचवी की परीक्षा दी, परिणाम आया तो जिले के टॉप टेन सूची में मेरा नाम था।
इसी तरह मजदूरी करते हुए, गरीबी और मुफलिसी के दिन बिताते हुए, आठवीं की परीक्षा भी विशेष योग्यता के साथ उत्तीर्ण की, ग्यारवी पास करने के बाद इंजीनियरिंग कॉलेज की तरफ से पत्र प्राप्त हुआ था, किंतु अर्थाभाव के कारण जा ना सका। फिर अपने गांव का पहला ग्रेजुएट बना था मैं ।और फिर शिक्षक बन गया। कर्मठता से अपने बच्चों को पढ़ाया, संस्कारित किया, मार्गदर्शन दिया, खुद इंजीनियर ना बन पाया पर, अपने विद्यार्थियों को डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर आदि बनने के लिए मार्गदर्शित करता रहा, आर्थिक मदद करता रहा, फ्री ट्यूशन पढ़ाता रहा,  और उनका आदर्श शिक्षक बना......
और आज.........
जिन सड़कों में नंगे पाँव चलकर, पैरों में जूते होने का सपना देखा करता था उसी सड़क पर अपनी खुद की कार से चल रहा हूं...........
और हां,... अब गांव का पहला स्लेब वाला मकान भी मेरा ही है।
    सच है! सच्ची लगन से सपने सच होते हैं।

     -सुश्री अंजुमन 'आरज़ू'✍

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