Skip to main content

लेखनी

बहर - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
वज़न - 2122  2122  2122  2122

                       ग़ज़ल

लेखनी की करके पूजा सर झुकाना चाहती हूँ ।
नित सृजन के गीत नूतन गुनगुनाना चाहती हूँ ॥

स्वाभिमानी हूँ मुझे बस चाहिए अपनी चमक अब ।
बनके जुगनू आसमां में झिलमिलाना चाहती हूँ ॥

दूर हो तम नफरतों का रोशनी हो नेह वाली ।
दीप ऐसा एकता का मैं जलाना चाहती हूँ ॥

अब न कोई भटक पाए हारकर हिम्मत कभी भी ।
हौसलों का सूर्य बनकर पथ दिखाना चाहती हूँ ॥

बांट के ग़म दूसरों के 'आरज़ू' को मिल रहा सुख ।
पोंछकर औरों के आंसू मुस्कुराना चाहती हूँ ॥©®
            -अंजुमन 'आरज़ू' ✍
09/11/2018

Comments

Popular posts from this blog

गरीबी गौरव गान

गरीबी  तो गौरव गान है । इसका बहुत सम्मान है । शबरी सा धीरज धर  के, कुछ तप भी करना पड़ता है । आस प्रभु की मन भरके, जग से लड़ना पड़ता है । तब बेर खाते श्री राम है ।। इसका बहुत सम्मान ह...

ग़ज़ल-13 ग़ौर से देखा तो ये सारा जहाँ तन्हा मिला

ग़ौर  से   देखा  तो   ये    सारा   जहाँ   तन्हा   मिला चाँद    तन्हा   रात   तन्हा   आसमाँ    तन्हा    मिला वो जो  महफ़िल  में  लगाता  फिर  रहा  था कहकहे राज़-ए-ग़म उसके भी  दिल में  हाँ निहाँ तन्हा मिला अपनी  तामीर -ए- ख़ुदी  में  हर  बशर मसरूफ़ है साथ  कितने  फ़र्द   हैं   पर  आशियाँ  तन्हा  मिला चश्मदीदाँ  थे   बहुत   उस    हादसे   के   भीड़  में  ख़ौफ़  के  मारे  मगर  बस  इक  बयाँ   तन्हा मिला साथ  पर्वत  कब   चले  हैं  राह  में  ये   सोच कर बह्र  की  चाहत में  इक  दरिया  रवाँ  तन्हा  मिला दूर    तन्हाई     करे    ऐसा    ...

कुछ मेरी भी तुम सुन लेते

सरला नारी को उन* लेते, सब निर्णय तुम खुद बुन लेते । मैंने  तेरे  मौन  पढ़ें  हैं, *कुछ मेरी भी तुम सुन लेते ॥* मेरा हर सृंगार तुम्ही से , बिछुए कंगन हार तुम्ही से । फिर भी मुझको भेज ...