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लेखनी

बहर - फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन
वज़न - 2122  2122  2122  2122

                       ग़ज़ल

लेखनी की करके पूजा सर झुकाना चाहती हूँ ।
नित सृजन के गीत नूतन गुनगुनाना चाहती हूँ ॥

स्वाभिमानी हूँ मुझे बस चाहिए अपनी चमक अब ।
बनके जुगनू आसमां में झिलमिलाना चाहती हूँ ॥

दूर हो तम नफरतों का रोशनी हो नेह वाली ।
दीप ऐसा एकता का मैं जलाना चाहती हूँ ॥

अब न कोई भटक पाए हारकर हिम्मत कभी भी ।
हौसलों का सूर्य बनकर पथ दिखाना चाहती हूँ ॥

बांट के ग़म दूसरों के 'आरज़ू' को मिल रहा सुख ।
पोंछकर औरों के आंसू मुस्कुराना चाहती हूँ ॥©®
            -अंजुमन 'आरज़ू' ✍
09/11/2018

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