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जीवन का गीत

जीवन का गीत सुनातीं हैं समन्दर की लहरें ।
धीरज से गुनगुनाओ ये ग़ज़ल की दो बहरें ।।

अपने खारे पन की पीड़ा कह नहीं पाता ।
दूर तक फैला है लेकिन बह नहीं पाता ।
इतना बड़ा होकर भी कहाँ समन्दर पूरा है ।
ऐसे ही दुनिया में हर इंसान अधूरा है ।
पर हिम्मत के सामने कब अधूरेपन ठहरें ।।

प्रेम भी एक समन्दर हे संभाले न संभले ।
फूल कहाँ फिर गालों में  खिल आते हैं गमले ।
पर जैसे समन्दर का सारा पानी खारा है।
वैसे ही इस प्रेम से हर कोई हारा है ।
उठ जातीं हैं दीवारें लग जाते हैं पहरे ।।

जीवन का गीत सुनातीं हैं समन्दर की लहरें ।
धीरज से गुनगुनाओ ये ग़ज़ल की दो बहरें ।।

    -अंजुमन 'आरज़ू'©✍

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