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राजकुमार

लघुकथा

        शासकीय सेवा में आने के लगभग एक महीने बाद, मधु अचानक घर लौटी थी । यह जानते हुए भी, कि कोई काम छोटा नहीं होता, किंतु पूर्व प्रसंग के कारण, अपने भाई को झाड़ू लगाते देख उसे याद आ गया, कि उन दिनों वह दसवीं में थी, मार्च का महीना था, परीक्षाएं चल रही थीं,  मधु परीक्षाओं की तैयारी करते-करते, मां को घरेलू कामों में हाथ भी बँटाती ।
        उस सुबह मधु अपने आंगन की तुलसी में, एक लोटा जल अर्पण कर जल्दी जल्दी रसोई की और बढ़ चली । पीछे से पिता जी की कड़कती आवाज आई - "मधु पीछे पलट..... यह दिखा नहीं तुझे...... भाई का ब्लैंकेट बिस्तर पर पड़ा है, चलते चलते उसे उठा नहीं सकती..... सब तरफ ध्यान रखना चाहिए.....। छोटा भाई संदीप वही बैठ टीवी देख रहा था । मधु अपने कड़क छवि वाले प्रशासक पिता से तो कुछ ना बोली, पर संदीप से कहा - "तू खुद नहीं रख सकता....? कम से कम इतना तो कर लिया कर....!! मेरे पेपर हैं ना.....
संदीप कुछ कह पाता, इससे पहले ही पिता का जोरदार तमाचा, मधु के गाल पर था...... तुम्हें पता है ना, वह मेरा #राजकुमार है, और तुम कौन सी बड़ी परीक्षा दे रही हो..?? कलेक्टर बन जाओगी क्या ?
    मधु को अधिक दुख इस बात का था कि मां भी मौन थी ....। वह आहत थी, क्योंकि आत्मा का कोई लिंग नहीं होता, वेद पुराण भी यही कहते हैं ।फिर यह सब कब तक ?
            बहरहाल समय बीता, और संघर्ष करती हुई मधु, सहायक प्राध्यापक बन गई ।और पुरुष प्रधान समाज की अवधारणा में, दो बेटियों के बाद हुए बेटे को, उनके लाड़ प्यार ने ही बेरोजगार बना दिया ......

रचना तिथि 14/01/2019
रचना स्वरचित एवं मौलिक है ।
©®🙏
-सुश्री अंजुमन मंसूरी 'आरज़ू'✍
छिंदवाड़ा मप्र

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