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जुनून

नामुमकिन को मुमकिन कर दे ऐसा जज़्बा जुनून है ।
कोशिश करने वालों के तो सारे रंग मरून हैं ।।

अपनी अपनी ज़िद पे अड़े हैं सीमा के दोनों ही छोर ।
वो भी अपनी माँ के बेटे हम भी तो हे सिरमोर ।।
पर मातृभूमि कब चाहती अपने बेटों का खून है ।।
नामुमकिन को मुमकिन कर दे ऐसा जज़्बा जुनून है ।।

संतुष्टि न हो तो अटारी चैन कहाँ पाती है ।
और कहीं तो छोटी सी कुटिया भी मुस्काती है ।
दुनिया है कितनी सुंदर गर अंतर्मन में सुकून है ।।
नामुमकिन को मुमकिन कर दे ऐसा जज़्बा जुनून है ।।

     -©अंजुमन 'आरज़ू' ✍
29/03/2018

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