उमंग की अंगुली में एक छोटा सा छाला आ गया था, जिसे देखकर रिचा सिसक सिसक कर रो रही थी ।
रिचा एक संयुक्त परिवार की बहू थी, जहां उसे अपने साथ-साथ, सभी की मान मर्यादा, सुख सुविधाओं का ध्यान रखना पड़ता, कौन कब और क्या खाता है ?किसे क्या नापसंद है ? कौन सी दवा किसे कब देना है ?आदि आदि .....सब जिम्मेदारियां रिचा के कांधों पर ही थी ।
नन्हा उमंग अभी 18 माह का ही हो पाया था, बोलना सीख रहा था अभी । जब रिचा का विवाह हुआ था, तो वह एक सम्मानजनक वेतन वाली निजी नौकरी में थी, किंतु उमंग के आने पर, मजबूरन उसे वह छोड़नी पड़ी । इस कारण सासू मां जब तब उसे ताने दिया करती । हालांकि पति और बच्चे के उठने से पहले ही, रिचा घर के अधिकांश काम निपटा लिया करती, किंतु यदि कभी फिर भी उमंग के तंग करने पर, किसी काम में विलंब हो जाता, तो पति भी डांट डपट में पीछे ना रहता ।
अभी कल ही की बात है, उमंग रो रहा था, तो रिचा उसे समझाने में लग गई, उधर ससुर जी को ऑफिस जाना था, अतः सासू मां रोटियां डाल रही थी, तब ब्रजेश जोर से चिल्लाया- "क्या करती रहती हो तुम,,, जरा सी रोटियां भी नहीं डाल सकती,,, मां बीमार है फिर भी काम कर रही हैं,,,,"
रिचा के मन में बहुत कुछ आया... पर वह बस इतना ही बोली- "आप उमंग को थोड़ी देर देखिए तो मैं अभी बना लेती हूं रोटियां...." कहकर वह रसोई में चली गई । ब्रजेश अपने मोबाइल में लग गया । उमंग मां मां मां करता हुआ रिचा की पैर पकड़ कर रो रहा था । रिचा को बहुत गुस्सा आ रहा था, कि ये बच्चे को भी नहीं संभाल सकते थोड़ी देर.....!!! पर विवश थी,,, क्या कहती ??? किस से कहती ??? उसने उमंग को गोद में लिया, और जैसे-तैसे रोटियां सेकने लगी, कुछ देर बाद उमंग की अंगुली में एक चरका लगा, और वह जोर से चीख कर रोया,,,,, रिचा दौड़कर फस्ट एड बॉक्स से दवा ले आई, और उमंग से ज्यादा तो वह रो रही थी । अब उसने अपनी खामोशी की चादर उतार फैंकी थी, और ब्रजेश को भी वो सब कुछ कहा, जो वह कहना चाहती थी ।
बच्चा सिसक सिसक कर रोता हुआ सो गया था, पर उसकी अंगुली में छाला आ गया था । रिचा उसे देख देख कर रो रही थी । व्रजेश ने और घर में सभी ने कहा कि कुछ नहीं होता, ज्यादा नहीं जला है, ठीक हो जाएगा,,, पर रिचा तो मां है ना, *मां की ममता* तो कह रही थी, कि यह छाला उमंग की अंगुली मैं नहीं, उसके मन में पड़ गया था ।
अंजुमन *)'आरज़ू'✍
©🙏
08/08/2018
हों गीत मेरे, संगीत भरे । लय ना लय हो, सरगम मुखरे । माँ शारदा विनती करूँ तुझ से । हों ये गीत अनूप, अटल-ध्रुव से । मेरे गीतों को आशीष दे माँ । ये मोहन हों, मुरली को धरे ॥1॥ लय ना लय हो स...
Comments
Post a Comment