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अभिव्यक्ति

मन की हर बात ना कह पाएँ, हो कितने ही क्यों ना ये शब्द मुखर ।
अभिव्यक्ति सदा ही अधूरी है, चाहे कितने भी हो लेख प्रखर ॥

ऐसा भी होता जीवन में, सामर्थ्य हीन जब शब्द मोती ।
वाणी भी गुमसुम हो जाए, तब मौन से भी अभिव्यक्ति होती ।
जब शब्दकोश भी रीता लगे, तब मौन का स्वर ही होता अमर ॥
अभिव्यक्ति सदा ही अधूरी है, चाहे कितने भी हो लेख प्रखर ॥

श्रंगार के रंग हजारों हैं, हर एक कहां वरणा जाए ।
आक्रोश भी अभिव्यक्ति चाहे, अश्रु धारा करुणा पाए ।
ना जीवन है अभिव्यक्त यहां, और मेरी समझ से दूर अजर ॥
अभिव्यक्ति सदा ही अधूरी है, चाहे कितने भी हो लेख प्रखर ॥

        -अंजुमन 'आरज़ू' ✍
28/08/2018
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अजर = ब्रह्मा, देवता

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