इतने अभाव होते हुए भी,
हार न मानी जीवन में ।
बनूँ प्रेरणा किसी की मैं भी,
सोचा था ये बचपन में।
बंसी के सीने में छेद हैं,
जब मैंने ये देखा था ।
मान लिया था तब जीवन को,
सुख दुख का एक लेखा था ।
बाबा से तब सीखा था,
कांटे भी होते मधुवन में ।
बनूँ प्रेरणा किसी की मैं भी,
सोचा था ये बचपन में।।
सुंदरता निर्झर की तब जब,
नीचे गहरी खाई है ।
नदियों ने भी अपनी राह में,
कितनी रुकावट पाई है ।
संघर्षों के बाद ही साशन,
कर पाते हैं जनमन में ।
बनूँ प्रेरणा किसी की मैं भी,
सोचा था ये बचपन में ।।
अपने दुख को बढ़ा न समझो,
देखो जरा जमाने को ।
जितना तुमको मिला है उतना,
तरस रहे वो पाने को ।
कीचड़ गर है आस-पास तो,
खिलो कमल से आंगन में ।
बनूँ प्रेरणा किसी की मैं भी,
सोचा था ये बचपन में ।।
पाया मैंने हर हंसते,
चेहरे के दिल में शूल लगा ।
जग का इतना गम देखा तो,
अपना गम मुझे धूल लगा ।
अपने दुखों को भूल गई अब,
मुस्काती हूं मन मन में ।
बनूँ प्रेरणा किसी की मैं भी,
सोचा था ये बचपन में ।।
दुख सबके जीवन के हर के,
हौंसलों का इतिहास रचूँ ।
हरि के, हर के, अवतारों के,
संघर्षों का विश्वास रचूँ ।
मुझे शारदे इतना वर दे,
प्रेरणा भर दूँ लेखन में ।
बनूँ प्रेरणा किसी की मैं भी,
सोचा था ये बचपन में ।
-अंजुमन'आरज़ू' ✍
छिंदवाड़ा मप्र•
सर्वाधिक असुरक्षित
22/06/2018
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